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इस अभागे देश को शहीदों का अपमान करने का कोई अधिकार नहीं है।

This unfortunate country has no right to insult the martyrs.

जाकिर हुसैन - 9421302699

आज की तारीख भारत में "शहीद दिवस" के तौर पर मनाने की एक औपचारिक परंपरा सी बन गई है, जिसे हम साल-दर-साल बाकी अन्य तिथियों की तरह ही मनाकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। शहीद बन शहादत का वरण करना कोई बच्चों का खेल नहीं है, जिसे हर कोई खेल ले। राष्ट्रहित या मानवता के लिए अपने आप को न्योछावर कर देना उत्सर्ग करने की चरम बिन्दु है।

अपने स्वार्थ के लिए किसी का खून कर देना या अपनी जान दे देना तो हम लोगों ने सीखा, पर राष्ट्रहित के लिए शहादत को गले लगाना तो दूर की बात है, हम अपनी भावी पीढ़ियों को भी ऐसा करने से मना करते रहे। शहीद दिवस के अवसर पर औपचारिकता का निर्वहन करते हुए शहीदों और शहादत के संबंध में बड़ी-बड़ी बातें कहना और बात है, पर उन्हें अमल में लाना कठिनतम कार्य है। अन्यथा कोई कारण नहीं है कि जिस देश में शहीदों और शहादत की एक लंबी परंपरा रही हो, वहां के लोग मूर्खता, जड़ता, यथास्थितिवाद और अकर्मण्यता की चादर ओढ़े लंबी तान कर सोने में ही आनंदित होते हैं।

आज की तारीख में भारत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस अंधकारमय परिस्थितियों से घिरा हुआ है, और देश की अस्मिता, गरिमा और संप्रभुता भी खतरे में है, वहां के लोग कुंभकर्ण की भांति खर्राटे ले रहे हैं। दिन-दुनिया की कोई फ़िक्र ही उन्हें नहीं है। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व व्यापार संगठन के साथ ही विकसित देशों से लिए गए कर्ज की जाल में फंसकर भारत छटपटा रहा है,पर हम ऐसे बुजदिल भारतीय हैं कि हमें इसकी कोई परवाह ही नहीं है। संविधान और लोकतंत्र खत्म कर दिए गए, नागरिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया, बेरोजगारी अबतक के अपने चरम पर है, देश के सारी संपत्ति, संपदा और प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ सारे सरकारी उद्योगों और लोक उपक्रमों, कल-कारखानों, कंपनियों और निगमों एवं आवागमन के सारे साधनों को पूंजीपतियों के हाथों धड़ल्ले से बेचा जा रहा है, पर देश में कहीं कोई सुगबुगाहट भी नहीं है। सबसे दुखद आश्चर्य तो यह है कि लोग देश की इस स्थिति तक पहुंचाने वाली वर्तमान फासीवादी सरकार की जय-जयकार कर रहे हैं।

सरकार की जनविरोधी नीतियों, निर्णयों और कार्ययोजनाओं का आंख मूंदकर समर्थन करना ही राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मान लिया गया है, और हर वह व्यक्ति जो सरकार की जनविरोधी नीतियों, निर्णयों और कार्ययोजनाओं का विरोध करने, उसके विरुद्ध आवाज उठाने, संघर्ष करने, आलोचना करने, प्रश्न पुछने और जनांदोलन और जनप्रतिरोध करने की हिम्मत जुटा भी पाता है, सरकार अपनी असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करते हुए पूरी सामर्थ्य और शक्ति के साथ उन्हें खत्म करने के लिए तैयार है। अपने विरोधियों को राष्ट्रद्रोही साबित और घोषित करना सरकार के लिए सबसे आसान तरीका है, और उससे भी आसान है, इन राष्ट्रद्रोहियों का सफाया करना।

सरकार का विरोध करने वालों को आतंकवादी, पाकिस्तानी, टुकड़े-टुकड़े गैंग, कम्युनिस्ट और अर्बन नक्सली कहकर जेलों में बंद कर देना या गोलियों से भून डालना सबसे सरल उपाय है। जहां किसी नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार भी नहीं है, वहां सरकार का यह कहना कि भारत में "टू मच आफ डेमोक्रेसी" है, भारतीय जनता को गुलाम बनाने और समझने के अलावा और कुछ भी नहीं है। जहां सारे संवैधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका, संसद, सीबीआई, आईबी, आईबीएन, सीवीसी, सीएजी, केन्द्रीय निर्वाचन आयोग और अन्य सारी स्वायत्त संस्थाओं को किसी एक व्यक्ति के इशारे पर नाचने के लिए मजबूर कर दिया गया हो, वहां भला टू मच आफ डेमोक्रेसी कहां से संभव है?

कोरोनावायरस के नाम पर लाकडाउन के दौरान लाखों-करोड़ों मजदूरों को रोजगार से वंचित कर हजारों किलोमीटर दूर जेठ की तपती धूप में तारकोल की सड़कों पर पैदल सपरिवार चलने को मजबूर किया गया, रास्ते में गुंडों और पुलिस बलों द्वारा डंडे से पिटाई की गई, और सैंकड़ों मजदूरों को भूख से तड़प कर मरने के लिए मजबूर किया गया, और भारत का सुविधाभोगी मध्यम वर्ग न सिर्फ मोदी सरकार की जय-जयकार करता रहा, उनके इशारों पर ताली, थाली, शंख और घंटा-घड़ियाल बजाता रहा ,बल्कि मजदूरों को कोरोनावायरस का वाहक कहकर उन्हें गालियां भी देता रहा। संपूर्ण राजव्यवस्था अपने पूरे शासन-प्रशासन के साथ लोक लोकतंत्र का खात्मा कर रहा है, मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता भूतकाल की बातें बनकर रह गई हैं, कर्ज के दलदल में फंस भारतीय अर्थव्यवस्था विनाश के गर्त में धकेल दी गई है, शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण कर उन्हें बहुसंख्यक मेहनतकश अवाम से दूर कर दिया गया है, शोषितों, दलितों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के प्रति सरकार के सारे दायित्व खत्म कर दिए गए हों, इनके शोषण, दमन और उत्पीड़न में दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी ही हो रही है, और लोगों को बोलने, लिखने-पढ़ने और सत्य का उद्घाटन करने से भी वंचित कर दिया गया हो, उस राज्य को फासीवादी न कहा जाए तो और क्या कहा जाए?

नवजवान मृतप्राय हैं, बुद्धिजीवी बुजदिल हो गए हैं, साहित्यकार समाज से कट गए हैं, कलम की धार कुंद हो गई है, स्याही सूख गई है, जज्बात मर चुके हैं, एहसास का दफन हो चुका है, सबकी जुबां पर ताले पड़े हैं, हाथ काट डाले गए हैं और लोगों ने इस स्थिति में समझौता कर लिया है। श्मशान की इस खामोशी को ही लोग रक्षा-कवच समझ रहे हैं। इसी बात से वे आनंदित हैं कि कम से कम वे खुद तो अबतक बचे हुए हैं। यह उन्हें पता नहीं है कि अगला नंबर उनका ही आनेवाला है। जो देश आजादी के लिए शहीद पैदा नहीं कर सकता, उसे आजाद होने का हक भी नहीं है। शहीद दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में शामिल होकर औपचारिकता का निर्वहन कर हम कम से कम उन शहीदों का अपमान तो न करें, जिन्होंने राष्ट्रहित के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति देने में गर्व का अनुभव करते रहे।

इस अभागे देश को शहीदों का अपमान करने का कोई अधिकार नहीं है। आज हमारे क्रांतिवीर शहीदे-आजम भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, रामप्रसाद बिस्मिल, असफाकउल्लाह खां, चन्द्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, उद्धम सिंह, बहादुर शाह जफर और उनके बेटे और उन जैसे हजारों हजार शहीद आसमान से अपने बुजदिल देशवासियों को निहार रहे होंगे। वे हमें क्या समझते होंगे, यह कल्पना कर ही मन सिहर उठता है, दिल में एक कचोट लगती है, और मन में एक हाहाकार-सा मच जाता है कि हम कितने बुजदिल और हिजड़े हैं? राम अयोध्या सिंह

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Updated : 24 March 2022 12:46 PM GMT
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