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कश्मीर फाइल्स के पीछे की साजिश और कश्मीर त्रासदी का सच - आखिरी भाग

The conspiracy behind the Kashmir files and the truth of the Kashmir tragedy - the last part

जाकीर हुसेन - 9421302699

4 जनवरी 1990 यह वह दिन था जब कश्मीर के अख़बारों में छपवाया गया कि सारे पण्डित कश्मीर की घाटी छोड़ दें वरना अच्छा नहीं होगा। कुछ इसी तरह की बातें चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर के जरिए कही जाने लगी। सरेआम ऐलान किया गया कि, "ये कश्मीर होगा, पण्डितों के बगैर पर उनकी औरतों के साथ" इसके बाद तो जैसे लोगों को हत्या और बलात्कार होने लगे। इन घटनाओं के बाद कश्मीरी पण्डितों को मजबूरन कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा। इतना सब होने के बावजूद भी कुछ कश्मीरी पण्डितों ने वहां रूकने की हिम्मत की, 1990 के बाद यही खेल जारी रहा जिससे 1997, 1998 और 2003 में पुनः बचे हुवे कश्मीरी पण्डितों का विस्थापन हुआ। एक अनुमान के मुताबिक अभी भी कश्मीर में करीब तकरीबन 80-90 हजार पण्डित रहते हैं, और आज भी आये दिन कश्मीरी पण्डितों पर हमले की खबरें सामने आती रहती है। सच है कि मस्जिदों से ऐलान हुए और टारगेटेड हमले हुये लेकिन, सरकार ने क्या किया? सुरक्षा देने के बजाये कश्मीरी पण्डितों को फटाफट घाटी छोड़ने को कही मनाया कही डराया और सरकार ने पलायन का माहौल बनाया फिर भगाने के लिये संसाधन भी उपलब्ध करवाये। इस तरह कश्मीर की आजादी की लड़ाई लड़ रहे नौजवानों को समझाने बुझाने, उनसे वार्ता करके मामले का शान्ति पूर्ण समाधान खोजने की बजाय उनकी लड़ाई को हिन्दू बनाम मुस्लिम की लड़ाई में तब्दील किया गया

जिस दौर में कश्मीरी पण्डितों पर हमले हो रहे थे उस समय तमाम कश्मीरी मुस्लिमों को भी निशाना बनाया गया था जिनमें नेशनल कान्फ़्रेंस और कांग्रेस के नेताओं के अलावा मीरवाइज मोहम्मद फारुख जैसे अलगाववादी नेता और आम कश्मीरी मुस्लिम भी शामिल थे। पाकिस्तानपरस्त इस्लामिक कट्टरपन्थियों के निशाने पर वे सभी लोग थे जो कश्मीर के पाकिस्तान में मिलने का विरोध कर रहे थे, चाहे वो भारत के नज़रिए से विरोध कर रहे हों या कश्मीर की आज़ादी के नज़रिए से। आतंकवाद के दौर में कश्मीरी पण्डितों से कई गुना ज़्यादा कश्मीरी मुस्लिमों, सिक्खों और अन्य समुदाय के लोगों की भी मौतें हुईं पर सिर्फ कश्मीरी पण्डितों को ही क्यूँ नाम लिया जा रहा है? तो निश्चित ही एक सोची समझी रणनीति के तहत ये काश्मीर त्रासदी का खेल खेला गया है।

इस कश्मीर फाइल्स फिल्म को बनाकर इस फिल्म के जरिये कई निशाने साधे गये हैं पर विशेषकर एक तीर से तीन निशाने पहला एक धर्म विशेष के खिलाफ जनता के दिलो में नफरत फैलाकर दंगाई बनाना, यानी अपने मुस्लिम एजेण्डे को आगे बढ़ाना। दूसरा वामपंथी यानी कम्युनिस्टों के प्रति घृणा फैलाकर उनकी हत्या करना। मोदी कह ही चुके हैं कि ये विचारधार सबसे खतरनाक है। संघ के लोग कहते रहते हैं कि कम्युनिस्ट लोग देशद्रोही होते हैं और ये लोग देश को गर्त में ले जायेंगे। तीसरा निशाना महंगाई, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर सरकार से कोई सवाल ना करे और ना ही इसके लिये सरकार को जिम्मेदार ठहराये और आपस में भी चर्चा ना कर इस फिल्म के जरिये तैयार किये गये नरेटिव से मुसलमानों और कम्युनिस्टों को कोसे और जरूरत पड़ने पर तलवार तक उठा कर धर्म के नाम पर नरसंहार करे।

Updated : 20 May 2022 10:34 AM GMT
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