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कश्मीर फाइल्स के पीछे की साजिश और कश्मीर त्रासदी का सच - भाग- 9

The Conspiracy Behind The Kashmir Files And The Truth Of The Kashmir Tragedy - Part 9

जाकीर हुसेन 9421302699

जगमोहन के 1990 के कार्यकाल में कश्मीरियों पर अघोषित आपातकाल थोप दिया था और सुरक्षाबलों को हत्या, बलात्कार, जबरन गिरफ्तारियां…. जैसे कारनामों के लिए खुली छूट दे दी गई थी और मजे की बात तो यह है कि सेना और पुलिस के इस बर्बरता को भारत की राष्ट्रीय मीडिया ने बाकायदा जस्टीफाई कर रही थी। सुरक्षा के नाम पर विदेशी मीडिया को कश्मीर घाटी से निकाल दिया था और लोकल यानी स्थानीय मीडिया को सरकारी अंकुश लगा दिया गया था जिससे खबरों के नाम पर ये दलाल मीडिया सिर्फ और सिर्फ झूठ परोस रही थी और राज भवन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति को ही सत्य नारायण कथा की तरह बांच रही थी।

राष्ट्रवाद के नाम पर कश्मीर घाटी के जनता पर बर्बर कार्यवाही को मीडिया और इन राजनैतिक पार्टी के माध्यम से न्यायसंगत बताने का जोर-शोर से ढिंढोरा पीटा गया किन्तु वास्तविक रूप से कश्मीर घाटी के जनता के दिलो-दिमाग में ऐसी कार्यवाहीयों पर भारत विरोधी भावनाओं के रूप में उभरता गया। कश्मीरी नागरिकों के सभी हिस्से यहां तक कि सरकारी कर्मचारीयों का वह वर्ग जो अपने-अपने विभागों के झंडे उठाए रहते थे वो भी आजादी की मांग को लेकर सड़कों पर राज्य और भारत सरकार के खिलाफ और कश्मीर की आजादी के लिये उतर आये। जिसके फलस्वरूप उस दौरान बैंक, डाक, बीमा और अन्य विभाग के अलावा सामाजिक और लोककल्याण सम्बन्धी काम भी ठप्प हो गये। सरकार ने लंबे-लंबे अंतराल के लिये लगातार कर्फ्यू लगाये। जिससे सभी प्रकार की गतिविधियों स्वतः ठप्प हो जाती।

सरकारी सत्ता के दमन की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना निर्वाहन मौलवी फारूक की हत्या के बाद निकले जनाजे पर फायरिंग के रूप में सामने आयी। शासक वर्ग के इस तरह के दमन और अत्याचार ने कश्मीरियों को हथियारबंद संघर्ष की और मुड़ने के लिये मजबूर कर दिया, कश्मीरी जनता के दिलों में भारत सरकार के खिलाफ जो अविश्वास था ऐसे दमन और अत्याचार ने घाटी के लोगों के दिलों में आग में घी का काम किया।

इसमें कोई शक नहीं कि जगमोहन ने स्वयं कश्मीरी पण्डितों को घाटी छोड़ने के लिए कहा और उनके पलायन के लिए गाड़‍ियाँ तक मुहैया करायीं ताकि उन्हें घाटी में निर्ममता से सुरक्षा बलों का इस्तेमाल करने का बहाना मिल जाये। एक लेखक व पत्रकार तवलीन सिंह सिंह लिखती हैं कि "यह तो सच ही है कि जगमोहन के कश्मीर में आने के कुछ दिनों के भीतर वे समूह में घाटी छोड़ गए और इस बात के पर्याप्त सबूत है कि पलायन के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराये गए थे।" जगमोहन के कार्यकाल में कश्मीरी पण्डितों को सुरक्षित माहौल नहीं मिल पाया जिसकी वजह से पण्डितों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। उस समय जम्मू व कश्मीर में तैनात वरिष्ठ नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह ने लिखा है कि घाटी के कई मुस्लिमों ने उनसे कश्मीरी पण्डितों के पलायन को रोकने की गुहार लगायी थी जिसके बाद उन्होंने जगमोहन से आग्रह किया था कि वे दूरदर्शन के प्रसारण के माध्यम से कश्मीरी पण्डितों को घाटी न छोड़ने के लिए कहें। लेकिन जगमोहन ने ऐसा करने की बजाय यह घोषणा की कि अगर कश्मीरी पण्डित घाटी छोड़ते हैं तो उनका इन्तजाम शरणार्थी शिविर में किया जायेगा और सरकारी कर्मचारियों को उनकी तनख़्वाहें मिलती रहेंगी।

शेष अगले भाग में....

अजय असुर

Updated : 13 April 2022 12:36 PM GMT
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