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कश्मीर फाइल्स के पीछे की साजिश और कश्मीर त्रासदी का सच - भाग- 7

The Conspiracy Behind The Kashmir Files And The Truth Of The Kashmir Tragedy - Part-7

जाकिर हुसैन - 9421302699


इसके बाद कश्मीर में शुरू हुआ खुनी खेल, कश्मीर में जगह-जगह ब्लास्ट होने लगे, गोलियां चलने लगीं। धरती का स्वर्ग कही जाने वाली कश्मीर घाटी आए दिन खून से लाल होने लगी। राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याओं को मुसलमानों द्वारा कश्मीरी पण्डितों की हत्या की तरह पेश किया औरतों और राजनीतिक हत्याओं को सांप्रदायिक हत्याओं के रूप में दिखाया गया। जिस दौर में कश्‍मीरी पण्डितों के साथ सबसे घृणित अपराध हुए उस समय दिल्ली में वी. पी. सिंह की सरकार थी जो भाजपा के समर्थन के बिना एक दिन भी नहीं चल सकती थी। लेकिन भाजपा ने कश्मीरी पण्डितों पर होने वाले ज़ुल्मों के मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया।

1987 के जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठजोड़ को बहुमत मिला और फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। 19 जनवरी 1990 को फ़ारूख़ अब्दुल्ला की सरकार इस्तीफ़ा देती है और कश्मीर में दूसरी बार राज्यपाल के पद पर पूर्व कांग्रेसी और उस वक्त का संघी जगमोहन मल्होत्रा को नियुक्त करती है केन्द्र की भाजपा समर्थित वी पी सिंह की सरकार। उस वक्त की राज्य सरकार को बर्खास्त कर जगमोहन का कश्मीर में आना कितना बड़ा षड़यंत्र है, आप इस बात से अंदाजा लगा लीजिये कि जगमोहन के पद सम्हालते ही कश्मीरी पण्डितों को पलायन के लिये मजबूर होना पड़ा। दिल्ली में बीजेपी समर्थित जनता दल की वी पी सिंह की सरकार 2 दिसंबर, 1989 को केन्द्र में आती है। जनवरी 1990 में पण्डितों का पलायन शुरू हो गया। बीजेपी ने कुछ नहीं किया और उसे कुछ भी करने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि वी पी सिंह की सरकार भाजपा का काम ही कर रही थी।

कुछ लोग कहते हैं कि वी पी सिंह तो कांग्रेसी थे। तो निश्चित ही वीपी सिंह एक समय कांग्रेसी ही थे। काफी वक़्त तक वो इंदिरा गांधी के काफी करीबी भी रहे, लेकिन इंदिरा के निधन के बाद राजीव गांधी के साथ उनके वैचारिक मतभेद हो गये। राजीव गांधी की कैबिनेट में रहते हुए वी पी सिंह बोफोर्स और एच डी डब्लू पनडुब्बी सौदों में रिश्वतखोरी का मामला उठाया था जिससे राजीव गांधी और कांग्रेस से उनके मतभेद हो गये थे। भाजपा ने 9 नवंबर 1990 तक वीपी सिंह को समर्थन देना जारी रखा। राजा मांडा उर्फ़ विश्वनाथ प्रताप सिंह जिसे वी पी सिंह के नाम से लोग जानते हैं, भारतीय जनता पार्टी ने 10 नवंबर 1990 को वी पी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और 11 महीने चली वी पी सिंह की सरकार गिर गयी पर गिरने से पहले आर एस एस का काम करके गयी, पर मजे की की बात यह है की समर्थन वापसी का कारण कश्मीर घाटी से पण्डितों का पलायन नहीं था बल्कि बाबरी मस्जिद बनाम राम मंदिर विवाद को गर्म करने के लिए जो यात्रा लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू की थी, उस यात्रा को 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में रोके जाने के बाद, इसी को कारण बना कर, समर्थन वापस लिया गया था।

वी पी सिंह के केन्द्र की सरकार जम्मू-कश्मीर के जनादेश से बनी फारूक अब्दुला की राज्य सरकार को स्तीफा देने के लिये मजबूर कर देती है जिसके फलस्वरूप 19 जनवरी 1990 को जम्मू-कश्मीर की फारूक अब्दुला अपने मुख्यमंत्री पद से स्तीफा दे देते हैं और दूसरा मुख्यमंत्री बनाने के बजाये आर एस एस के इशारे पर राज्यपाल जगमोहन द्वारा 19 दिसंबर 1990 को ही विधानसभा भंग कर देती है और राष्ट्रपति शासन को केन्द्र सरकार लागू कर देती है और ये सारा खेल आर एस एस द्वारा पूर्व प्रायोजित होता है। इसके मुख्य किरदार जगमोहन मल्होत्रा को 19 दिसंबर 1990 को ही तत्काल गवर्नर श्री के. वी. कृष्णा राव जिन्हें जुलाई 1989 को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया था, को 5 महीने के भीतर ही हटाकर जगमोहन को दूसरी बार जम्मू कश्मीर के गवर्नर पद की शपथ दिलाई गई और बीजेपी के नरेन्द्र मोदी को वहा का प्रदेश प्रभारी बना दिया जाता है। ताकि ये अपना प्रायोजित खेला खेल सकें। बस यही से खेल शुरू हो जाता है भाजपा का! कश्मीरी पण्डितों के नाम पर हिन्दुओं की भावना से खेल का! उस वक्त हुवे हालात का मुख्य रूप से दो लोग जिम्मेदार थे एक तत्कालीन नियुक्त राज्यपाल जगमोहन और दूसरा जम्मू-कश्मीर का भाजपा प्रभारी बनाकर भेजे गये नरेन्द्र मोदी।

शेष अगले भाग में....

अजय असुर

Updated : 10 April 2022 7:53 AM GMT
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