Home > M marathi blog > 10 जुलाई ईदुल अज़हा पर विशेष

10 जुलाई ईदुल अज़हा पर विशेष

Special on 10th July Eidul Azha

10 जुलाई ईदुल अज़हा पर विशेष
X

10 जुलाई ईदुल अज़हा पर विशेष

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का आदर्श जीवन और क़ुरबानी उनकी अविस्मरणीय सुन्नत का प्रतीक

बेशक मेरी नमाज़ और मेरी कुरबानी और मेरा जीना और मेरा मरना सिर्फ सब लोकों के पालनहार ईश्वर के लिए है


--------- डॉ एम ए रशीद, नागपुर

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम यशस्वी अल्लाह के दूत थे । अल्लाह ने उन्हें इराक में भेजा था और उन्होंने सारी दुनिया के इंसानों को एक ईश्वर की उपासना की ओर बुलाया था । यही कारण है कि हज़रत इब्राहीम को सभी धर्मों में बडे आदर का स्थान प्राप्त है । अल्लाह के दूतों में भी उन्हें विशेष स्थान प्राप्त है । उन्हें अल्लाह का दोस्त की संज्ञा से पुकारा जाता है । विदित हो कि इंसानों के मार्गदर्शन के लिए अल्लाह समय समय पर विभिन्न स्थानों पर अपने पैगम्बर / दूत भेजता रहा है । सबसे पहले पैगम्बर हज़रत आदम थे और उन्ही से मानवता का आरंभ भी हुआ था । हज़रत मोहम्मद सअव अंतिम पैगम्बर थे जो अब से लगभग 1500 वर्ष पूर्व मक्का में भेजे गए थे ।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को यह भी दर्जा प्राप्त है कि उनके आदर्शों का अनुकरण ईश्वर के अंतिम प्रेषित मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दिया गया। इस का संबंध पवित्र क़ुरआन की सुरह नहल , पंक्ति क्र 123 से है कि "फिर हमने आपकी ओर रहस्योद्घाटन भेजा "। पवित्र क़ुरआन की इस पंक्ति में अनुसरण करने का अर्थ है धर्म की मान्यताओं और सिद्धांतों से सहमत होना है। इसका पालन करने के लिए आपको जो आदेश दिया गया है वह आपकी महानता और उत्कर्ष की अभिव्यक्ति है कि आपको इब्राहीम के धर्म को अपनाना चाहिए। हज़रत इब्राहीम ( अलैहि) के लिए उनके सभी गुणों और सिद्धियों में सर्वोच्च अनुग्रह और सम्मान है क्योंकि वह पहले और अंत में सबसे सम्मानित हैं। जैसा कि तिर्मिज़ी की हदीस में है कि "सभी दूतों और सब प्राणियों से आप का पद श्रेष्ठ और महान है"।


कुरबानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की एक अविस्मरणीय सुन्नत है। इस्लाम में इसे अनिवार्य और आदर्श हिस्सा बना दिया गया। क़ुरबानी के दिन को ईदुल अज़हा कहा जाता है। यह मुसलमानों के दो प्रमुख त्योहारों में से एक है । इस त्योहार को इस्लामी कैलेंडर के अंतिम महीने "जुलहिज्जा" के 10 वें दिन मनाया जाता है। कुरबानी का यह त्योहार पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम का अल्लाह के आदेशों के समक्ष स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर देने और अपने बेटे को कुरबानी के नाम पर तैयार हो जाने की याद का प्रतीक है । इस कठिन परीक्षा में बेटे के स्थान पर एक जानवर आ गया था । इस प्रकार ईदुल अज़हा त्योहार में अल्लाह के नाम पर जानवर को कुरबान कर हर मुसलमान अपने इसी संकल्प को दर्शाता है कि हज़रत इब्राहीम की तरह वह और उसका सबकुछ अल्लाह को समर्पित है ।

विश्वभर में फैले लगभग 200 करोड़ मुसलमान इस त्योहार को अपनी पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं और ईश्वर के आदेशों के समक्ष अपने पूर्ण समर्पण के प्रदर्शन में प्रतीकवश एक जानवर की कुर्बानी पेश करते हैं ।

जानवरों को कुरबान करने की प्रथा अन्य धर्मों में किसी न किसी रूप में पाई जाती है । प्राचीन ग्रीस , मिस्र , चीन और रोमन सभ्यता और स्वयं हमारे देश में जानवरों के बलि चढ़ाने की प्रथा मिलती है । यहूदी और ईसाइयों के यहाँ भी जानवरों की कुरबानी किए जाने का वर्णन मिलता है । हिन्दू धर्म में भी इस सम्बन्ध में जानकारी ऋग्वेद , अथर्ववेद आदि ग्रंथों में मिलती है ।


कुरबानी बतौर इबादत एक विशेष स्थान रखती है। इसकी परंपरा आज से 4500 वर्ष पूर्व हज़रत इब्राहीम द्वारा स्थापित हुई थी। इस परम्परा के पालन में सारी दुनिया के मुसलमान ईदुल अज़हा के दिन जानवर की कुरबानी करते हैं ।

ईदुल अज़्हा के अवसर पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत को अदा करते समय उनके अन्य गुणों और आदर्शों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए , जिनके परिणामस्वरूप वे उत्कृष्टता को पहुंचे थे । इब्राहीम अलैहिस्सलाम के आदर्श आज हम मुसलमानों के लिए पाठ का विषय हैं।

अल्लाह सर्वशक्तिमान ने पवित्र क़ुरआन में हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का बार-बार उल्लेख बहुत विस्तार से किया है। उनमें तौहीद अर्थात एकेश्वरवाद पर खड़े रहना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण बहुदेववाद के करीब भी न जाना भी है । हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का पहला पाठ अल्लाह की एक अकेली हस्ती पर अंतिम सीमा तक विश्वास और भरोसा है। जैसे कि पवित्र क़ुरआन की सूरह नहल में बताया गया है कि --

120 पंक्ति के अनुसार "वास्तव में इब्राहीम एक समुदाय था, अल्लाह का आज्ञाकारी एकेश्वरवादी था और मिश्रणवादियों (मुश्रिकों) में से नहीं था" (अर्थात वह अकेला सम्पूर्ण समुदाय था। क्योंकि उस के वंश से दो बड़ी उम्मतें बनीं थीं , एक बनी इस्राईल और दूसरी बनी इस्माईल जो बाद में अरब कहलाए।


121 पंक्ति के अनुसार "उसके उपकारों को मानता था, उसने उसे चुन लिया और उसे सीधी राह दिखा दी" ,

122 पंक्ति के अनुसार "और हमने उसे संसार में भलाई दी और वास्तव में वह परलोक में सदाचारियों में से होगा" ।

पवित्र क़ुरआन की सुरा आले इमरान की पंक्ति क्र 67 में है कि "इब्राहीम न यहूदी था और न नसरानी , बल्कि सिर्फ अल्लाह का ही रहे वाला मुस्लिम था और वह शिर्क करने वालों में से न था"।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का दूसरा विशेष गुण अल्लाह के आदेशों का पूरी तरह पालन करने से है। वे अल्लाह के आज्ञाकारी , सदा अल्लाह का अनुकरण करने वाले और उसके प्रत्येक आदेश के सामने नतमस्तक होने वाले थे । ये झलक उनकी ज़िंदगी में दिखाई देने वाली सभी घटनाओं पर ध्यान देने से प्रतीत होती हैं। अति गंभीर परीक्षा के अवसर पर भी उन्होंने ईश्वर की बंदगी में पल भर के लिए भी समझौता नहीं किया। ऐसे समय उनमें समीचीनता के विचार तक नहीं आए। जैसे ही अल्लाह का आदेश मिलता वे आज्ञाकारिता में अपना सिर झुका देते । सिर्फ अनुकरण के मामले में अल्लाह के आदेश आने की देर रहती थी । ईश्वर के किसी भी आदेश के पालन में उसका परिणाम क्या होगा इसका उन्हें कोई विचार तक नहीं आता था। वास्तव में ईश्वर सर्वशक्तिमान को अपने आज्ञाकारिता के बारे में बंदों से ऐसी ही निश्चितता और विश्वास अपेक्षित रहता है। इसलिए ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम (अ) के इन गुणों की कई बार प्रशंसा की है।


अल्लाह का सदैव यह तरीका रहा है कि वह अपने नेक बन्दों को प्रशिक्षण और उनमें मज़बूती पैदा करने के लिए वह विभिन्न प्रकार के परीक्षणों और परिक्षाओं से गुज़रता रहता है । हज़रत इब्राहीम को अपने जीवन में ऐसे अनेकों परीक्षणों से गुज़ारना पड़ा । उनका सबसे कठिन परीक्षण तब हुआ जब उन्होंने स्वप्न देखा कि वह अपने बेटे हज़रत इस्माईल को कुरबान कर रहे हैं । हज़रत इब्राहीम ने इसे अल्लाह का आदेश माना और अपने बेटे की स्वीकृति के साथ उन्हें कुरबान करना चाहा , परन्तु अल्लाह ने उन्हें रोक दिया और कहा कि बस तुम्हारी परीक्षा लेना उद्देश्य था जिसमें तुम सफल हो गए । अल्लाह ने उसकी जगह एक जानवर की कुरबानी करने का आदेश दिया । इस प्रकार उन्होंने और उनके बेटे ने यह सिद्ध कर दिया कि उनका पूरा जीवन अल्लाह के लिए समर्पित है । इस्लाम का तो उद्देश्य यही है कि वह समस्त इंसानों को , स्वयं को अपने वास्तविक मालिक अल्लाह के समक्ष पूर्ण रूप से समर्पित कर देने का आह्वान करे । जो लोग इस आह्वान को स्वीकार कर लेते हैं वे मुसलमान कहलाते हैं। अपने इसी समर्पण की अभिव्यक्ति के लिए दुनिया के सारे मुसलमान हर साल ईदुल अज़हा के दिन हज़रत इब्राहीम द्वारा दी गई कुरबानी को मनाते हैं । हज़रत इब्राहीम के बाद आने वाले सभी पैग़म्बर और उनके अनुयायी कुरबानी की प्रथा को आगे बढ़ाते रहे हैं । अंतिम पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सअव ने भी इस प्रथा को जारी रखा और सदा के लिए मुसलमानों के समक्ष यह आदर्श छोड़ गए कि वह भी हर साल इस प्रथा को जारी रखें । यही कारण है कि समस्त मुसलमान उनका अनुसरण करते हुए इस प्रथा को जारी रखे हुए हैं ।

पैगंबर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम वीर पुरुष की हैसियत से मानव जाति के लिए एक महान नेता और शिक्षक थे । इसी कारण उन्हें उम्मत भी कहा जाता है। इसका संबंध आध्यात्मिकता से है , क्योंकि जो व्यक्ति किसी राष्ट्र का नेता होता है वह उनके सभी कर्मों में भागीदार होता है और मानो वह एक उम्मत हो। वे राष्ट्र निर्माण करने वाले व्यक्ति थे। वे ऐसे माहौल में तौहीद के बड़े पैरोकार थे, जबकि तौहीद की सांस लेने वाला कोई नहीं था।

उनके परिवार ने हर तरफ से अपना मुंह मोड़ कर अल्लाह की ओर कर लिया था । आस्था का वही तत्व जो हज़रत टइब्राहीम का हिस्सा था उनकी पत्नी बीबी हाजिरा का भी था जो उनके बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम में हस्तांतरित हो गया था।


ईदुल अज़हा में अदा की जाने वाली कुरबानी आध्यात्मिकता पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाती हैं । सर्व प्रथम इसका आरम्भ नमाज़ से होता है जो अपने मालिक और पालनहार से सम्बन्ध स्थापित और मज़बूत करने का सबसे कारगर तरीका है । हज़ारों , लाखों मुसलमान एक साथ एक आवाज़ पर अपने मालिक के सामने अपना सर ज़मीन पर रख देते हैं । उस समय अपने मालिक से जितना करीब वे होते हैं किसी और समय नहीं होते । कुरबानी तो नाम है अपने मालिक के आदेश का पालन करने का है । इससे बड़ी आध्यात्मिकता क्या होगी कि आदमी अपने मालिक के एक इशारे पर अपना सबकुछ , यहाँ तक कि अपना जी - जान भी कुरबान करने को तैयार हो जाए ! इस्लाम इस आध्यात्मिकता को ' तक़वा ( ईशपरायणता ) का नाम देता है और कुरबानी इंसानों में यही तक़वा पैदा करती है । कुरबानी के समय पढ़ी जाने वाली दुआ आध्यामिकता की सच्ची भावना को व्यक्त करती है कि "बेशक मेरी नमाज़ और मेरी कुरबानी और मेरा जीना और मेरा मरना सिर्फ सब लोकों के पालनहार ईश्वर के लिए है" ।

आध्यात्मिकता के कारण ही लोगों के मध्य दूरियां बहुत हद तक मिट जाती हैं । जब कोई कुरबानी का गोश्त मांसाहारी गरीब , पास पड़ौसी और रिश्तेदारों के दरवाज़े पर लेकर जाता है तो उस समय सम्बन्धों में नवीनीकरण का दिन होता है । इस दिन मात्र अल्लाह की खुशी के लिए ही सही आदमी अपने नाराज़ रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भी गले लगा लेता है । इस प्रकार सम्बन्ध सुधारने और उनमें मधुरता पैदा करने का एक अच्छा अवसर मिल जाता है ।



Updated : 2022-07-09T12:10:57+05:30
Tags:    
Next Story
Share it
Top