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सेक्स वर्क यानी यौन शोषण एक लीगल वर्क या गुलामी

Sex work means sexual exploitation is a legal work or slavery

सेक्स वर्क यानी यौन शोषण एक लीगल वर्क या गुलामी
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जाकीर हुसेन - 9421302699

दो सूचनाएं एक साथ। जरूर दोनों का एक दूसरे से संबंध है। एक तो यह कि सरकारी महकमें में 60 लाख पद खाली हैं, मौजूदा सरकार उस पर नागिन की तरह कुण्डली मारकर बैठी है और देश के युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं। दूसरी अहम् सूचना यह है कि देश की सर्वोच्य आदलत सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को आदेश देते हुए कहा कि "वेश्यावृत्ति एक पेशा है और सेक्स वर्कर्स कानून के तहत सम्मान और सुरक्षा के हकदार हैं।" सर्वोच्य न्यायालय ने यह कहकर भारत में औरतों द्वारा वेश्यावृति यानी सेक्स वर्क (प्रास्टिटूशन) को लीगल करार दिया है। ये आदेश यूं ही नहीं आया है शासक वर्ग ने प्रायोजित तरीके से सुप्रीम कोर्ट द्वारा मीडिया के जरिये रोजगार के सवाल से मेहनतकश जनता का ध्यान भटकाने के लिये और नये तथाकथित रोजगार को बढ़ावा देने के लिये लाया है। यानी सरकार रोजगार नहीं देगी, अब आप खुद आत्मनिर्भर बनें, भले ही जिस्मफरोशी करना पड़े।

सेक्स को रोजगार तो बना दिया गया है। मगर क्या सेक्स कोई श्रम है? सेक्स कोई श्रम नहीं है, यदि यह श्रम होता तो शोषक वर्ग के लोग इसे भी श्रमिकों से ही करवाते। परन्तु यह श्रम नहीं है। यह भोजन और नींद की तरह एक नैसर्गिक (नेचुरल) क्रिया है जिसे हर व्यक्ति को किसी मजबूरी में नहीं, सिर्फ अपनी इच्छा व पसंद पर ही करने की व्यवस्था होनी चाहिये। नैसर्गिक क्रिया को पेशा बताना प्रकृति और नैतिकता के विरुद्ध और बहुत ही गलत है। मगर पूँजीपतिवर्ग का काम ही है कि वो हर चीज को बाजार में खींच लाता है। और उसे अपनी पूँजी बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करता है।

ऐसा नहीं कि कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में सेक्स का बाजार बनेगा। दरअसल पहले से सेक्स का एक बड़ा बाजार अवैध रूप से चल रहा था, होटलों, पबों, थिएटरों, कोठों, चकलाघरों में सेक्स वर्करों का शोषण जारी रहा है वह और बढ़ जाएगा। मँहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, गरीबी, तंगहाली, भुखमरी से पीड़ित अधिकांश लोग मजबूरन इस पेशे में पहले से ही ढकेले जा चुके हैं। इन सेक्स वर्करों का अवैध रूप से शोषण जारी था। बिचौलिए, भणुवे, दलाल और मालिक वर्ग सभी मिलकर कमीशन खाते थे। मगर अब तक यह सब अवैध रूप से चल रहा था तो सरकार को टैक्स नहीं मिलता था। अब इस फैसले से वह देहव्यापार वैध हो गया। अब जो वेश्यावृत्ति होगी उस पर सरकार को भारी टैक्स मिलेगा। और सरकार चलाने वाले वर्ग के लोग वेश्यावृत्ति के इन अड्डों को वैधानिक रूप से संचालित करेंगे, और सेक्स वर्करों का शोषण करके भारी मुनाफा कमाएंगे तथा सरकार को टैक्स अदा करेंगे। अब तक अवैध ढंग से चल रहा था तो हफ्ता के रूप में पुलिस वाले अवैध टैक्स वसूलते थे, मंत्री, विधायक, सांसद यानी नीचे से ऊपर तक सबको इस काली कमाई में से अवैध तरीके से कमीशन मिलता था। अब इस धन को वैधानिक रूप से इनकम टैक्स के अधिकारी व कर्मचारी लोग वसूलेंगे। इस टैक्स के पैसे से सरकारी खजाना भरा जाएगा। फिर सरकार चलाने वालों को हिस्सा मिलेगा।

अब तक इस आमदनी को जीडीपी में शामिल नहीं किया जाता था। परन्तु अब इस आमदनी को बड़ी बेशर्मी के साथ जीडीपी में शामिल कर दिया जाएगा, इससे जीडीपी दर जो नीचे गिर रही है वो ऊपर उठ जाएगी। अब बेरोजगारी की दर घटा दी जाएगी। क्योंकि सरकार यह बतायेगी कि इतने करोड़ सेक्स वर्कर हैं, जो कि कानूनन रोजगार शुदा माने जाएंगे। इससे कृतृम तौर पर अपराधों का ग्राफ गिरेगा क्योंकि कल तक जो देहव्यापार अपराध था, उसे अपराध माना ही नहीं जाएगा। उसे कानूनी जामा पहनाकर रोजगार के तौर पर पेश किया जाएगा।

सरकार के पास जनता के लिये कोई रोजगार नहीं तो यही पेशा सही। सबको आत्मनिर्भर बना रहे हैं। महंगी से महंगी पढ़ाई करो और फिर पकौड़ा बेचने का पेशा अपनाकर आत्मनिर्भर बनो। "इस गुलामी की स्थिति को समाप्त करने के संघर्ष के बजाय एनजीओ वादी व कुछ बुर्जुआ नारीवादी कहते हैं कि इसे वर्क मानकर गौरवान्वित महसूस करो और जैसे अन्य श्रमिक श्रम अधिकारों के लिए लडते हैं वैसे ही वेश्यावृत्ति को सुखद एवं आनंदमय बनाने के अधिकार के लिए लडो। जैसे मोदी ने लिखा था कि मेहतर को अपने काम में ही गर्व महसूस करना चाहिए। शोषण से मुक्ति की कामना के बजाय शोषित को शोषण में गौरव महसूस कराना शासक वर्ग के लिए सर्वोत्तम उपाय है। मुक्ति की बात वह सोचेगा जो इसे निजी संपत्ति आधारित पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था व अन्याय जनित गुलामी मानेगा।"

किसी भी देश और वहाँ के लोगों के लिये यह शर्म की बात होनी चाहिये कि जनता के लिये रोजगार ना हो पाने की स्थिति में देह व्यपार को भी रोजगार मान लिया जाये और उसको लीगलाइज बना दिया जाये और उसको वैध करने के लिये देश की सबसे बड़े न्यायालय को आगे आकर करना पड़े।

इसके पीछे की साजिश

इस पर चर्चा नहीं कि आखिर देह धन्धा क्यूँ? क्यूँ कोई औरत मजबूरी में अपना जिस्म अपनी आत्मा को चन्द पैसे के लिये बेचना पड़ रहा है? क्या यह गुलामी नहीं है? क्या किसी पेशे में गुलामी होती है? निश्चित ही नहीं होती है जिस व्यक्ति ने उस औरत के जिस्म को जितने समय के लिए खरीदा उतने समय की उस औरत की गुलामी। यह कोई सेक्स वर्क, वर्क नहीं गुलामी है और इस गुलामी को कानूनन वैद्य बनाने की कोशिश किया जा रहा है। इसपर बातकर एकजुट होकर संघर्ष करने की बजाये शासक वर्ग के चंगुल में फंसकर उन माँ-बहनों-बहुवों-बेटियों को जिस्म फरोशी के धंधे में ढकेलने की तैयारी कर खुदको गौरवान्वित महसूस कर रहें हैं। आज पड़ोसी की माँ-बहन-बहु-बेटी मजबूर होकर ये पेशा अपनाने को मजबूर हैं और निश्चित ही कल आपके घर की माँ-बहन-बहु-बेटी की बारी आयेगी क्योंकि देश में रोजगार नहीं है और जो मुट्ठीभर रोजगार है वो भी खत्म किया जा रहा है। इस पर एकजुट होकर संघर्ष करने के बजाये हम शासक वर्ग द्वारा फेंके गये जाल में फंसकर गाय-गोबर-गंगा, हिन्दू-मुसलमान-सिख्ख-ईसाई, मन्दिर-मस्जिद-चर्च गुरद्वारा, राम-रैदास-अम्बेडकर-अल्लाह हू अकबर, मूलनिवासी बनाम विदेशी, 15 बनाम 85, मेरा धर्म-मेरा भगवान-मेरा अल्लाह-मेरा गाड-मेरा वाहेगुरु सबसे बड़ा सबसे पुराना सबसे अच्छा सबसे नेक…. इसी में पड़कर आपस में लड़ रहें हैं और शासक वर्ग मजे से शासन कर रहा है….

अब दलाल मीडिया प्रॉस्टिट्यूट (वेश्या) की तरफदारी कर बहस कराएगा और जनता भी इसी बहस में उलझ जायेगी कि हमारा संविधान भी सभी को कोई भी व्यवसाय चुनने का आजादी/अधिकार देता है और उस प्रॉस्टिट्यूट को समय पर और पूरा मेहनताना मिलना चाहिये, किसी भी तरह का इनका अपमान ना हो, पुलिस इनको बेवजह परेशान ना करें और उनकी रक्षा करे…. लिहाजा अब भी इस बात पर डिबेट जारी है कि देह व्यापार को क़ानूनी मान्यता दी जाए।

अब तय आपको करना है कि शासक वर्ग द्वारा दिये गये मुद्दे में उलझकर यूं ही हम आपस में लड़कर शासक वर्ग का काम आसान करेंगे या फिर एकजुट होकर इस थोपी जा रही गुलामी के खिलाफ आवाज उठाना है….

Updated : 31 May 2022 7:59 AM GMT
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