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तुम्हारे विचारों की प्रासंगिकता ...शहीद दिवस पर विशेष

Relevance of your thoughts...special on Martyr's Day

तुम्हारे विचारों की प्रासंगिकता ...शहीद दिवस पर विशेष


जाकिर हुसैन - 9421302699

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कितना प्रासंगिक है

आज भी तुम्हारे क्रांतिकारी विचार

आज भी जब जेलों की तस्वीरें नहीं बदली

शोषण के खिलाफ उठती आवाज

डाली जा रही है सलाखों के पीछे

बिल्कुल प्रासंगिक है तुम्हारे विचार

आज भी जब

हो रही है जाति धर्म की राजनीति

हो रहे हैं दंगे, छप रही है तनाव की तस्वीरें

धार्मिक उन्मादता पहुंच रही है चरम पर

प्रासंगिक है पढ़ना तुम्हारे नास्तिक विचार

आज भी जब

जनता की बात करने वाले

तुम्हारी तरह ही

घोषित किये जा रहे हैं अपराधी

उनपर भी थोपे जा रहे हैं झूठे आरोप

नहीं दिया जा रहा

अपनी बात रखने का मौका

जेल के अंदर बना दी जा रही है

उनकी जिंदगी भी बदतर

प्रासंगिक है तुम्हारे विचार

आज भी जब

अंग्रेजी हुकूमत की तरह वर्तमान सत्ता

लूट रही है जनता की आजादी

छिन रही है उनसे जल-जंगल-जमीन

और चला रही है उनपर

बंदूक का शासन

प्रासंगिक है जानना तुम्हारे विचार

आखिर क्यों तुम निकल पड़े थे

क्रांति की राह पर

अपनी पूरी जिंदगी गंवाकर

तुम और तुम्हारे साथी क्यों हो गए शहिद

तुम्हारे शहादत के बाद भी

क्यों है तुम्हारे सपने अधूरे

और उन सपनों तक पहुंचने का

क्या है आज का रास्ता

प्रासंगिक है इनसबके लिए तुम्हारे विचार

क्योंकि तुम और तुम्हारे साथियों की शहादत

नहीं जाने देनी है बेकार

आज भी तुम्हारे सपनों के साथ

तुम्हारी ही राह पर बढ़ रहे हैं तुम्हारे अपने

आज भी प्रासंगिक है तुम्हारी लड़ाई

क्योंकि शोषण विहिन समाज के लक्ष्य तक

तुम्हारे सपनों की दुनिया तक

पहुंचना अभी बाकी है।

इलिका

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23 मार्च

23 मार्च

सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं

एक आईना है

जिसमें झाँको!

पूछो ख़ुद से

ज़िंदा होने का अर्थ

शर्माओ नहीं

मुर्दों की भीड़ में

अकेले नहीं तुम

आत्माएँ औरों की भी

मरी हुई हैं

भागो मत!

शहीदों का लहू

अभी सूखा नहीं है

जिस्म उनके गर्म हैं

साँसें चल रही हैं

उन्हें महसूस करो

अपने भीतर

मुँह मत छिपाओ

कायर तुम अकेले नहीं हो

बोझ सिर्फ़ तुम्हारे ही

सिर पर नहीं है

उनके भी था

जिन्हें साल में एक बार

याद करने की

रस्म अदा करते हो

ज़ालिम अब भी मौजूद है

सिर्फ़ चेहरे और कपड़े

बदल गए हैं

गुरूर और ज़ुबान वही है

मैं नहीं कहता

कि उठो और चूम लो

फंदा फाँसी का

तुममें इतना सामर्थ्य नहीं

बस बुलंद करो

आवाज़ अपनी

ज़ुल्मोसितम के ख़िलाफ़

अहंकारी का घमंड

तोड़ नहीं सकते तो

कोई बात नहीं

पर उसे इतनी तो ख़बर हो

कि जिस राख की ढेर पर

वह बैठा है

उसमें चिन्गारी अभी ज़िंदा है

इतना भी हुआ

तो यह तारीख़

सुर्ख़रू होने पर

अफ़सोस नहीं करेगी

चंद्रपाल

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वीर भगत सिंह

जब किरणें डूबने लगती है

हर ज्योति बुझने लगती है

चारों ओर अंधेरा छाकर

खुद को डसने लगती है

तब हर आशा की आँखो में

कोई लौ सा चमकने लगता है

कोई वीर भगत सा जनमता है

कही वीर भगत सिंह जनमता है ,

हर सासें रुकने लगती है

आवाज़ भी दबने लगती है

छीनकर सारे अधिकारों को

जब ज़ुल्म सा होने लगती है

अपने मुल्क़ में बंधक होकर

हमसे सारी भूमि छीनकर

जब राज किसी का होता है

तब उसके अत्याचार से ऊबकर

आवाज़ कही से आता हैं

ओ क्रांति का स्वर होता है

ओ वीर भगत का होता है ,

जुल्मी शासन जनता की

जब बात कोई ना सुनता है

बेरहम बेदर्द सा बनकर

अत्याचार सब करने लगता हैं

आँखे भी बंद कर लेता है

जनता के सारे दुःख दर्दों से

झुंड सभी औरत मर्दों के

जो चिर भीड़ को आता है

ओ वीर भगतसिंह होता है

ओ वीर भगतसिंह होता हैं ,

अपनी सरकारें जनता का

जब भूख प्यास ना हर सके

बहनों के तन के वसनों को

सत्ता में जाकर छीन सके

मान का उसकी मोलभाव

फिर करने लगे अखबारों में

रोजी रोटी न्याय की खातिर

बुलाने लगे दरबारों में

देख कर जनता की यह हालत

तब सीना किसी का फटता है

सीने को फिर चीर बग़ावत

करने कोई निकलता है

ओ भगत आज का होता है

ओ वीर भगत सिंह होता है ,

तब वीर भगत सिंह लड़ता है

आज़ाद वतन की शासन में

जनता के संग लड़ता है

अत्याचार कुशासन से

हक दिलाने खातिर लड़ता

अधिकार किसी के माटी का

सत्ता पाकर हक खाता जो

जनता की मेहनत रोटी का

सत्ता पाकर बन जाता है

इन्सान जो शैतानो के जैसा

उसके कानों के नीचे करता

आवाज़ असेंबली के जैसा

उसकी आवाज़ दबाने खातिर

झूठें इल्ज़ाम जिसपर लगता हैं

फिर भी सत्ता से लड़ने वाला

ओ वीर भगत सिंह होता है

ओ वीर भगत सिंह होता है

बिमल तिवारी "आत्मबोध"

देवरिया उत्तर प्रदेश

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कौन थे तुम

मुझे तुम अपनी पगड़ी दे दो।

मुझे तुम्हारी कुछ तस्वीरें चाहिए।

मुझे तुम्हारा नाम बार बार लेना है।

मैं तुम्हारा बड़ी बड़ी मूंछों वाला टैटू बना लेता हूं।

मैं तुम्हें साल में 2 बार माला चढ़ाना चाहता हूं।

तुम शहीद हुए थे, नहीं नहीं तुमने तो बलिदान दिया था।

तुम अपनी टोपी क्यों नहीं उतर देते?

तुम्हारी पगड़ी गहरी पीली क्यों है?

इसे मैं केसरिया क्यों न कर दूं?

पगड़ी हरी होनी चाहिए, नहीं नहीं नीली।

तुम्हारे पास रिवॉल्वर थी ना?

तुम सिर्फ फांसी पर चढ़े थे क्या?

या तुमने कुछ जिया भी था?

कुछ कहा? कुछ सुना? कुछ लिखा?

क्या कहा?

तुम हाड़ मांस के बने थे?

तुम सोचते भी थे?

तुम सौम्य थे?

ओ हो!

तो तुम मुस्कुराते भी थे?

मुहब्बत भी जानते थे?

अच्छा तो क्या,

तुम्हारे विचार भी थे?

तुम किताबें भी लिखते थे?

तुम विचारों का संघर्ष चाहते थे?

तुम तर्क में विश्वास रखते थे?

तुम एकता चाहते थे?

तोड़ना चाहते थे शोषण की सत्ता? जाति का चक्र? श्रम की लूट?

तो तुम सिर्फ पगड़ी, फांसी, मूछें और टैटू नहीं थे ?

उससे ज्यादा थे?

तुम वही थे क्या?

हां हां वही?

जो होना गुनाह है अब??

तुम कौन थे भगत?

कौन थे तुम?

अनिरुद्ध

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क्रांति

सच ही कहा था

व्यक्ति को कुचल कर वे

हमारे विचारों को

नही मार सकते

इस लिए भगतसिंह के विचार

हर युग में क्रांति की

ललकार लिए

शोषितों के हक़ में खड़े है

भगतसिंह का रोमांस

हर तानाशाह के खिलाफ

करारा तमाचा है

और उस के लिए रोमांटिक है

जो क्रांति चाहता है।

कुलदीप

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Updated : 24 March 2022 12:14 PM GMT
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