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प्रस्तावना ! संयुक्त राज्य भारत का संविधान

Preface ! United States Constitution of India

संयुक्त राज्य भारत का संविधान

प्रस्तावना


जाकिर हुसैन - 9421302699

जब यह निश्चित हो गया कि भावी भारत का संविधान तैयार करने का कार्य संविधान सभा को सौंपा जाने वाला है, तो उसके बाद अखिल भारतीय अनुसूचित जाति परिसंघ की कार्य समिति ने मुझसे कहा कि मैं अनुसूचित जातियों के सुरक्षोपायों के विषय में एक ज्ञापन तैयार करूं, जिसे परिसंघ की ओर से संविधान सभा में प्रस्तुत किया जाए। मैंने सहर्ष यह काम अपने हाथ में ले लिया। मैंने जो कुछ श्रम किया, उसके परिणाम इस विवरण-पुस्तिका में उल्लिखित हैं।

इस ज्ञापन में मूल अधिकारों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और अनुसूचित जातियों के सुरक्षोपायों की परिभाषा दी गई है। जिन लोगों का यह विचार है कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक नहीं हैं, वे यह कह सकते हैं कि मैंने निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण किया है। यह धारणा कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक नहीं हैं, उच्च और शक्तिसंपन्न हिन्दू बहुसंख्यक की ओर से जारी की गई एक नई व्यवस्था है और अनुसूचित जातियों से कहा जाता है कि वे इस बात को मानकर चलें। लेकिन बहुसंख्यक वर्ग के प्रवक्ता ने इसकी व्याप्ति और इसका अर्थ नहीं बताया है। नवीन एवं स्वतंत्र विचारों वाला कोई भी व्यक्ति इसे सामान्य प्रस्ताव के रूप में देखते हुए जब यह कहेगा कि इसके दो निर्वचन किए जा सकते हैं, तो ऐसा कहना न्यायोचित होगा। मैं इसका निर्वचन यह करता हूँ कि अनुसूचित जातियों की दशा अल्पसंख्यकों से भी खराब है और नागरिकों तथा अल्पसंख्यकों को जो भी संरक्षण दिए जाएंगे, वे अनुसूचित जातियों के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, इसका अभिप्राय यह है कि अनुसूचित जातियों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति अन्य नागरिकों और अल्पसंख्यकों की तुलना में इतनी खराब है कि उन्हें उस संरक्षण के अलावा जिसे वे नागरिकों तथा अल्पसंख्यकों के नाते प्राप्त करेंगे, बहुसंख्यकों के अत्याचार और भेदभाव के विरुद्ध विशेष सुरक्षोपायों की जरूरत होगी। दूसरा निर्वचन यह है कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यकों से भिन्न हैं। अतः वे उस संरक्षण के लिए हकदार नहीं हैं, जिनका दावा अल्पसंख्यकों द्वारा किया जाय। यह निर्वचन मूर्खतापूर्ण दिखाई पड़ता है और किसी भी विवेकशील व्यक्ति को इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। यदि अनुसूचित जातियां इस निर्वचन को स्वीकार न करें तो उन्हें क्षमा प्रदान की जाए। जो लोग मेरे इस निर्वचन को स्वीकार करते हैं कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक नहीं हैं, वे मुझे यकीन है, मेरे इस विचार से सहमत होंगे कि अनुसूचित जातियों के लिए मेरी यह मांग औचित्यपूर्ण है कि उन्हें नागरिकों के मूल अधिकारों की समस्त सुविधाएं, अल्पसंख्यकों की रक्षण संबंधी समस्त सुविधाएं दी जाएँ और साथ ही उनके लिए विशेष सुरक्षोपाय किए जाएं।

यह ज्ञापन संविधान सभा में प्रस्तुत किया जाना था। इसे सार्वजनिक रूप से जारी करने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन मेरे सवर्ण हिन्दू मित्रों ने मुझसे आग्रह किया कि इस ज्ञापन को व्यापक रूप से प्रचारित किया जाए। उन मित्रों को इसकी टंकित प्रति पढ़ने का मौका मिल गया था। यद्यपि यह संविधान सभा के सदस्यों के लिए है, फिर भी इसे जनसाधारण के लिए सुलभ कराने में मुझे कोई अनौचित्य दिखाई नहीं पड़ता। अतः मैं उनकी बात मानने के लिए राजी हो गया हूँ।

अपने विचारों का उल्लेख सामान्य भाषा में करने की बजाए मैंने इस ज्ञापन का प्रारूप संविधान के अनुच्छेदों के रूप में तैयार किया है। मुझे विश्वास है कि सुनिश्चितता और सुस्पष्टता की दृष्टि से यह तरीका अधिक सहायक सिद्ध होगा। अनुसूचित जाति परिसंघ की कार्यकारिणी की सुविधा के लिए मैंने कुछ व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ और अन्य आंकड़े भी तैयार किए थे। चूँकि ये टिप्पणियाँ और आंकडे़ सामान्य पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे, अतः मैंने इन्हें ज्ञापन के साथ-साथ छपवाना बेहतर समझा।

संविधान सभा के समक्ष अनेक समस्याएं आएंगी। उनमें से दो निश्चित रूप से अत्यंत जटिल हैं। पहली समस्या है अल्पसंख्यकों की और दूसरी है देशी राज्यों की। मैं देशी राज्यों की समस्या का छात्र रहा हूँ। इस विषय पर मेरे कुछ निश्चित और स्पष्ट विचार हैं। मुझे आशा थी कि संविधान सभा मुझे देशी राज्यों की समिति के लिए चुनेगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि इस कार्य के लिए प्रतिभाशाली व्यक्ति मिल गये हैं। इसका कारण यह भी हो सकता है कि चूंकि मैं उनके खेमे से बाहर का व्यक्ति हूँ, अतः अवांछनीय हूँ। शामिल न किए जाने पर मुझे कोई अफसोस नहीं है। मुझे खेद इसलिए है कि मैं उस अवसर से वंचित रह गया हूँ, जिसकी मैं समिति के समक्ष अपने विचार पेश करने के लिए आशा कर रहा था। अतः अब मैंने यही उचित समझा है कि नागरिकों, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जातियों के अधिकारों के साथ-साथ उन्हें इस विवरणिका में शामिल करूं, ताकि अधिक से अधिक लोग उनका वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकें और उचित मूल्यांकन कर सकें तथा उनका उसी ढंग से इस्तेमाल कर सकें, जिसे वे उपयुक्त समझें।

भीमराव अम्बेडकर

राजगृह,

दादर,

मुम्बई-

14, 15-03-४७

("बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड-2 आठवां संस्करण 2014-प्रकाशकः डा. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार नई दिल्ली "पृष्ठ 169-170)

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Updated : 14 April 2022 3:29 AM GMT
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