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ईदुल-अज़हा का संदेश मुस्लिम समुदाय के नाम

Message of Eid-ul-Adha to the Muslim community

ईदुल-अज़हा का संदेश मुस्लिम समुदाय के नाम
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ईदुल-अज़हा का संदेश मुस्लिम समुदाय के नाम


---------- मुफ़्ती मोहम्मद आरिफ़ क़ासमी , मुरादाबादी

इमाम और खतीब, जामा मस्जिद, मोमिनपुरा, नागपुर ।

ईदुल-अज़हा इस्लाम का दूसरा प्रमुख त्योहार है । यह अपनी अहमियत, फ़ज़ीलत , जान माल की कुरबानी और इंसान के दिल की पाकीज़गी के हवाले से विशिष्ट पहचान और विशेषताओं से जुड़ा हुआ है।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के कर्म अगर एक ओर ईश्वर की निकटता और खुशी का कारण हैं तो दूसरी ओर हर कदम पर आज्ञाकारिता, विनम्रता, अधीनता, ईमानदारी , निस्वार्थता, धैर्य और शुक्र से परिपूर्ण हैं।

ईदुल अज़हा, ईमानदारी , सच्चाई और बलिदान की एक ऐसी अद्वितीय घटना है जिसका उदाहरण आज तक कोई कौम पेश नहीं कर सकी ।इसलिए अल्लाह ने इस सर्वश्रेष्ठ और उच्चतम घटना को क़यामत तक के लिए जारी रख दिया ताकि ईदुल-अजहा की ऐतिहासिक हैसियत पर दृष्टि रखते हुए मोमिन बन्दे अपने अंदर भी वही जज़्बा पैदा करें , अल्लाह की प्रसन्नता हासिल करने के लिए वह सब कुछ क़ुरबान कर दें जो उनके पास उपलब्ध हो , लेकिन अफसोस का स्थान है कि हमने उसे भी रस्मो रिवाज बना डाला , न उसकी हक़ीक़त को पहचाना और न उसके तक़ाज़े को समझा। स्पष्ट है कि अल्लाह तआला को न जानवर का गोश्त चाहिए होता है और न उसका ख़ून, बल्कि यहां मोमिन का तक़्वा और अल्लाह की रज़ा आवश्यक है ‌।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की घटना में हमारे लिए बड़ी नसीहत है कि हमने भी यही इकरार किया है कि हमारे पास जो कुछ है वह हमारा नहीं है , अल्लाह का है। हम अल्लाह के आदेश पर चलेंगे और उसके आदेश के सामने हम अपने दिल की ना बात मानेंगे और ना ही किसी दूसरे की इच्छाओं की परवाह करेंगे। हम पवित्र क़ुरआन की सुरा अल अन आम की पंक्ति क्र 162 के अनुसार "आप फ़रमा दीजिए मेरी नमाज़ , मेरी इबादतें , मेरा जीना और मरना यकीनन अल्लाह ही के लिए है जो संपूर्ण विश्व का परवरदिगार है"। इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है कि हम जिस तरह जानवर की कुर्बानी करते हैं उसी तरह अपनी मनोवैज्ञानिक इच्छाओं को कुरबान करें ताकि आपसी मतभेद , तनाव , द्वेष , ईर्ष्या, घमंड, दुश्मनी , धोखाधड़ी , वियोग , अनादर , अधिकारों का हनन जैसी मानवता विरोधी क्रियाएं मानवता के विनाश का माध्यम ना बन सकें बल्कि श्रेष्ठता और बुलंदी के बारे में पवित्र कुरआन ने जिन निर्देशों का निर्धारण किया है उसे अपनी जिंदगी में लाने की फिक्र करना चाहिए।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की घटना हमारे लिए बड़ी नसीहत वाली है । उसके बारे में हमने भी यही इकरार किया है कि हमारे पास जो कुछ है वह हमारा नहीं है , अल्लाह का है। हम अल्लाह के आदेश पर चलेंगे और उसके आदेशों के सामने ना अपने दिल की बात मानेंगे और ना किसी दूसरे की इच्छाओं की परवाह करेंगे। इसका उल्लेख पवित्र क़ुरआन की सुरा अल अनआम की पंक्ति क्र 162 में मिलता है कि "आप फ़रमा दीजिए मेरी नमाज़ , मेरी इबादतें , मेरा जीना और मरना यकीनन अल्लाह ही के लिए है जो संपूर्ण विश्व का परवरदिगार है"। हम जिस तरह जानवर की कुरबानी करते हैं उसी तरह अपनी मनोवैज्ञानिक इच्छाओं को कुर्बान करने का साहस करना चाहिए । इसलिए कि आपसी मतभेद , द्वेष और ईर्ष्या, घमंड, दुश्मनी , धोखाधड़ी और वियोग , अनादर , अधिकारों का हनन मानवता के विनाश का माध्यम न बन सकें बल्कि सर्वश्रेष्ठता और बुलंदी का जो निर्धारण पवित्र क़ुरआन ने बताया है उसे अपनी जिंदगी में लाने की फिक्र करना चाहिए।


ईदुल अज़हा मनाने का उद्देश्य यह है कि मुसलमानों के अंदर कुरबानी की वही आत्मा , ईमान की वही कैफियत और अल्लाह के साथ मोहब्बत और वफादारी की वही शान पैदा हो जिसका प्रदर्शन हजरत इब्राहीम अलौहिस्सलाम ने अपनी पूरी ज़िंदगी में किया है । इस प्रकार कुरबानी का पाठ पूरे साल हमारे सामने रहना चाहिए ताकि हम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त कर सकें । अगर अल्लाह ने हमें उच्च पद से नवाजा है तो हमें अपना समय नाजायज लाभ प्राप्त करने में व्यतीत नहीं करना चाहिए बल्कि अल्लाह के बंदों को राहत पहुंचाने का भरसक प्रयास करना चाहिए । अपनी जबान या कलम से किसी जरूरतमंद को लाभ पहुंचा सकते हों तो उसमें भी किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए। यहां तक कि सुन्नते इब्राहीमी की अदायगी के हसीन मौके पर हमें पैगाम मिलता है कि अल्लाह के रास्ते में हर तरह की कुरबानी देने के लिए हम हमेशा तैयार हैं । इसके साथ ही अपने घमंड को मिट्टी में मिलाकर हमें अपने रिश्तेदारों और हमसाया के साथ हुस्न सुलूक का बर्ताव करना चाहिए । मुस्लिम समुदाय की सर बुलंदी के लिए जिस वक्त जिस हाल में जैसी कुर्बानियां की आवश्यकता हो हम बिना झिझके , आनाकानी के खुशी खुशी अपने आप को पेश करने के लिए प्रतिबद्ध रहना चाहिए।

अल्लाह तआला हम सब की कुर्बानियों को कुबूल फरमाए । कुरबानी के उद्देश्यों और पैगाम को समझ कर उसके अनुसार ज़िंदगी गुज़ारने की तौफीक़ अता फरमाए ।

Updated : 2022-07-07T10:35:16+05:30
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