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हिन्दू मुसलमानों के बीच दंगा भड़काना और हिन्दू-मुसलमानों में एकता की बात करना दोनो ही जनता के लिए खतरनाक है तो कैसे?

Instigating riots between Hindu-Muslims and talking of Hindu-Muslim unity are both dangerous for the public, so how?

जाकीर हुसेन - 9421302699

कश्मीर फाइल्स के बहाने

कश्मीर फाइल्स के बहाने मोदी सरकार हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाकर एक बड़े नरसंहार की योजना बना रही है। यह ग़लत है। इसके जवाब में विपक्ष के लोग हिन्दू मुस्लिम एकता की बात कर रहे हैं। यह भी ग़लत लाईन है।

पक्ष-विपक्ष दोनों की लाईन जनता के विरुद्ध है, मगर कैसे? पूरा पढ़िए-

दरअसल जिस वर्ग के हाथ में सत्ता होती है, वही वर्ग अपने हितों के अनुरूप कला, साहित्य, फिल्म, संस्कृति और राजनीति का भी प्रचार-प्रसार करता है ताकि लोग उसके हितों के विरुद्ध कोई विद्रोह न करें। साहित्य और फिल्मों के जरिये हमारे देश का शासक वर्ग लम्बे समय से जनता के दिलोदिमाग में अंधविश्वास, पाखण्ड, जातिवाद और साम्प्रदायिकता का जहर भरता रहा है।

अक्सर हर फिल्म की एक ही जैसी कहानी होती है एक नायक, एक नायिका, एक खलनायक होता है, नायक पर खलनायक जुल्म ढाता है, अक्सर नायिका को खलनायक उठा ले जाता है, और नायिका को बचाने के लिए नायक अकेले ही खलनायक की हवेली पर चढ़ जाता है। खास बात यह होती है कि खलनायक हथियारों से सुसज्जित व पूरी तरह से गोलबंद होता है जबकि नायक अकेले और निहत्थे ही उसकी हवेली पर चढ़कर उसके गुर्गों को एक-एक कर मार डालता है। इस दौरान नायक मरणासन्न हो जाता है। उसके परिवार वाले किसी मंदिर या दरगाह में प्रार्थना या इबादत करते हैं, तब तक वह मरणासन्न नायक उठ बैठता है, और मार-धाड़ शुरू कर देता है। अन्त में वह नायिका को छुड़ा लेता है और यहीं पर कहानी खत्म हो जाती है।

"आरक्षण" जैसी कुछ फिल्मों में नायक गोलबंदी बनाता है मगर गांधी के बन्दर की तरह किसी भी सूरत में हथियार न उठाने की कसम खाता है। मतलब फिल्मों का संदेश साफ-साफ है- सत्ता में बैठे खलनायकों के खिलाफ लड़िए तो हथियार मत उठाइये, अकेले ही खलनायक की हवेली पर चढ़ जाइए और अगर संगठन बनाकर शोषक वर्गों के खिलाफ लड़िए तो कुछ भी हो, हथियार मत उठाइए। हकीकत में दोनों ही तरीके खलनायकों के ही पक्ष में होते हैं।

कांग्रेस के शासन में कुछ फिल्मों में हिन्दू मुस्लिम एकता की सीख दी जाती है तो भाजपा के शासन काल में ताना जी, और कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों के जरिये हिन्दू मुसलमानों के बीच नफरत फैलाकर दंगा भड़काने की प्रेरणा दी जाती हैं। कांग्रेस हो या भाजपा दोनों का ही तरीका थोड़े अन्तरों के साथ जनता को गुमराह करने तथा शोषक वर्ग के पक्ष में रहा है।

दंगा कराने वालों की साजिशें तो आसानी से समझ में आ जाती है कि किस तरह कुछ बड़े नेता साम्प्रदायिक दंगों में नरसंहार करवा कर विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक बन जाते हैं। मगर आप हैरान होंगे कि हिन्दू मुस्लिम एकता की बात भी एक तरह से खलनायकों के पक्ष में हैं, और जनता के खिलाफ।

दरअसल आप हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात को अच्छा मानते रहे। इसलिए आप के मन में सवाल उठ रहा होगा कि हिन्दू मुसलमानों के बीच दंगा भड़काना और हिन्दू-मुसलमानों में एकता की बात करना दोनो ही जनता के लिए खतरनाक है तो कैसे?

सभी धर्मों में अच्छे और बुरे लोग हैं। इन अच्छे और बुरे लोगों की एकता बनायेंगे तो बुराई के खिलाफ लड़ेंगे कैसे? इसी तरह सभी धर्मों में शोषक और शोषित हैं, अगर सभी धर्मों की एकता बनायेंगे तो सभी धर्मों के शोषक और शोषित एक हो जायेंगे। तो शोषक वर्गों के खिलाफ लड़ेंगे कैसे?

ठीक इसी तरह आप देख सकते हैं कि हमारे देश में खलनायक के तौर पर बड़े-बड़े पूंजीपति और सामन्त हिन्दुओं में हैं और मुसलमानों में भी। जब दंगा भड़काया जाता है तो वही देशी-विदेशी पूंजी के दलाल ही उग्र हिन्दुओं का नेतृत्व करते हैं और दूसरी तरफ इसी तरह के खलनायक ही उग्र मुसलमानों का नेतृत्व करते हैं। जब जनता लड़कर थक जाती हो तो विदेशी पूंजी के दलालों का दूसरा गुट आता है और वह हिन्दू मुस्लिम एकता की बात करता है, या गंगा-जमुनी तहजीब की बात करता है। इस तरह हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर भी उन्हीं खलनायकों का एक गुट जनता का नेतृत्व करता है। इस दौरान थोड़ा शान्ति तो हो जाती है, मगर इसी दौरान दंगाईयों का गुट अगले दंगों की तैयारी करता है।

दोनों ही तरीके से खलनायकों को फायदा होता है, उन्हें कोई नुक्सान नहीं है। हिन्दू-मुस्लिम मिलकर खलनायकों की रक्षा करें तो, खलनायकों के लिए तो और भी अच्छा है। इस तरह खलनायकों को हिन्दू-मुस्लिम एकता में तो ज्यादा ही फायदा है। इसी तरह की एकता में आरएसएस जैसे खतरनाक संगठन फलते-फूलते और बढ़ते हैं।

अब आप के मन में यह प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि अगर हिन्दू-मुस्लिम एकता भी नहीं तो कैसी एकता बनाएं? कैसी एकता बनाना जनता के हित में है? इसका जवाब है मेहनतकशों की एकता।

हम मेहनतकशों की एकता चाहते हैं। हिन्दुओं में मुट्ठी भर लोग हराम की खाने वाले हैं और मुट्ठी भर लोग मुसलमानों में भी। हम हराम की खाने वाले हलाल की खाने वाले दोनों की एकता नहीं चाहते। हराम की खाने वाले बड़े-बड़े देशी-विदेशी पूंजीपतियों व बड़े-बड़े सामंती भूस्वामियों के साथ मजदूर-किसान-बुनकर-दस्तकार-छोटे दुकानदार एकता बनायेंगे तो अपने बच्चों के हक अधिकार के लिए इन लुटेरों से लड़ कैसे पायेंगे?

अत: हम हिन्दू-मुस्लिम दंगा करके आजाद नहीं हो सकते। हम हिन्दू मुस्लिम एकता बनाकर भी आजाद नहीं हो सकते। हम सिर्फ और सिर्फ मेहनतकशों की एकता बनाकर ही आजाद हो सकते हैं।

आज हम मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, दंगा, फसाद,देशभक्ति के नाम पर युद्धों न्याय से पीड़ित हैं। हमारी इन बुनियादी समस्याओं से छुटकारा न तो हिन्दू-मुस्लिम दंगा से मिलेगा और ना ही हिन्दू-मुस्लिम एकता से।

सभी धर्मों के छात्र, नौजवान, मजदूर, किसान, बुनकर, दस्तकार, छोटे व्यापारी, छोटे दुकानदार, उत्पीड़ित सरकारी कर्मचारी सभी लोग संगठित होकर सभी जातियों, धर्मों, नस्लों के जालिमों/शोषक वर्गों से संघर्ष करके उनकी सत्ता को उखाड़ कर एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था कायम करें जिसमें कोई इन्सान किसी इन्सान का खून न पी सके। यानी एक ऐसा समाज जो खुशहाल हो जंहा एक इन्सान द्वारा दूसरे इन्सान का किसी भी तरह शोषण ना हो।

Updated : 21 March 2022 2:30 PM GMT
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