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भारत श्रीलंका बनने की ओर अग्रसर : भाग- 9

India moving towards becoming Sri Lanka: Part 9

जाकिर हुसैन - 9421302699

श्रीलंका से पहले भी कई देश दिवालिया हुए हैं

1- भारत भी कभी दिवालिया होने की कगार पर आ गया था- 1991 भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग ख़ाली हो चुका था। एक अरब डॉलर से भी कम बचा था। ये डॉलर महज 20 दिनों के तेल और आवश्यक सामग्री के भुगतान में खत्म हो जाते। भारत के पास इतनी विदेशी मुद्रा भी नहीं थी कि बाक़ी दुनिया से कारोबार कर सके। भारत का विदेशी कर्ज 72 अरब डॉलर पहुँच चुका था। ब्राज़ील और मेक्सिको के बाद भारत तब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कर्ज़दार देश था। देश की अर्थव्यवस्था और सरकार से लोगों का भरोसा खत्म होने लगा था। महंगाई, राजस्व घाटा और चालू खाता घाटा दोहरे अंक में पहुँच गए थे जैसे आज हो गये हैं आज तो महंगाई दर सारे रिकार्ड तोड़ उच्चतम स्तर पर पहुँच गयी है। भारत में महंगाई की तो अभी झांकी है, असल महंगाई तो अभी इस साल के अन्त तक आनी बाकी है। महंगाई को रोकना इन पूंजीवादी सरकार के बस में नहीं है।

1989 में जनता दल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई। लेकिन यह गठबंधन सरकार जाति और मज़हब की लड़ाई में फँस गई, देश भर में दंगे हुए। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दे पर रथयात्रा शुरू किए जाने और मुख्यमंत्री लालू यादव द्वारा बिहार में आडवाणी को गिरफ्तार किए जाने के बाद पार्टी ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वीपी सिंह सरकार ने विश्वास मत हारने के बाद 11 नवंबर 1990 को इस्तीफा दे दिया। चंद्रशेखर 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए और उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी बनाई। चंद्रशेखर सरकार को बाहर से कांग्रेस का समर्थन मिला और वे भारत के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने आखिरकार 6 मार्च, 1991 को इस्तीफा दे दिया। स्तीफा देने से पहले चंद्रशेखर की सरकार 20 टन सोना गिरवी रख चुके थे।

इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। ऐसी स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था घुटने टेक चुकी थी। एनआरआई अपना पैसा निकालने लगे थे और निर्यातकों को लगने लगा था कि भारत उनका उधार नहीं चुका पाएगा। महंगाई सातवें आसमान पर थी। तेल की क़ीमतें बढ़ाई गईं, आयात रोका गया, सरकारी खर्चों में कटौती की गई और रुपए में 20 फ़ीसदी तक का अवमूल्यन किया गया। बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की। भारत ने आईएमएफ से 1.27 अरब डॉलर का कर्ज़ लिया, लेकिन इससे हालात नहीं सुधरे।

पीवी नरसिम्हा राव 21 जून 1991 में प्रधानमंत्री बने और उनके मंत्रिमंडल में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के अगुवाई में 24 जुलाई 1991 को डंकल प्रस्ताव जिसे उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के नाम से भी जाना जाता है, पर हस्ताक्षर कर दूसरे देशों को लूटने के लिये आमंत्रित किया तब आईएमएफ ने कर्ज दिया। जिससे उस वक्त का आर्थिक संकट तो टल गया पर भारत को अमेरिका और आई एम एफ ने अपने मकड़जाल में फंसा लिया और नतीजा आज आपके सामने है।

2- वेनेजुएला में जब नोट हो गए कबाड़- वेनेजुएला में 2017 में शुरू हुए आर्थिक संकट ने देश को दिलाविया घोषित करा दिया। विदेशी कर्ज और गलत आर्थिक नीतियों ने करेंसी का हाल इतना बुरा कर दिया कि सरकार को 10 लाख बोलिवर (वेनेजुएला की लोकल करेंसी) का नोट तक छापना पड़ा। जिससे मुद्रास्फीति बढ़ गयी और करेंसी की वैल्यू इतनी खराब हुई कि एक-एक कप कॉफी के लिए लोगों को 25-25 लाख बोलिवर तक की कीमत चुकानी पड़ी। 500 ग्राम बोनलेस चिकन की कीमत 2.94 डॉलर, 12 अंडों के लिए 2.93 डॉलर तक लोगों को चुकाना पड़ा। भारत से अगर तुलना करें तो 12 अंडों के लिए आपको 1 डॉलर से भी कम खर्च करने पड़ते हैं 2017 में। एक लीटर दूध की कीमत भी 80 हजार बोलिवर तक चुकाने पड़े। एक किलोग्राम टमाटर के लिए 1.40 डॉलर तक लोगों को चुकाने पड़े लोगों को दूध-आटा जैसे सामानों के लिए बोरे में भर भरकर नोट चुकाने पड़े। असुर

शेष आगे अगले भाग 10 में

Updated : 11 Jun 2022 5:08 AM GMT
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