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भारत श्रीलंका बनने की ओर अग्रसर : भाग- 8

India moving towards becoming Sri Lanka: Part-8

Zakir Hussain 9421302699

वित्त मंत्रालय के अनुसार भारत सरकार पर कुल कर्ज का बोझ बढ़कर 128.41 लाख करोड़ रुपये हो गया है। सन् 2006 में भारत पर विदेशी कर्ज 10 लाख करोड़ था, जो 2013 में बढ़कर 31 लाख करोड़ हुआ। यानी, 7 साल में 21 लाख करोड़ रुपए विदेशी कर्ज बढ़ा। 2014 से 2021 तक 31 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 46.4 लाख करोड़, यानी भारत ने साढ़े सात साल में विदेशों से साढ़े पंद्रह लाख करोड़ का विदेशी कर्ज लिया है। यदि इतना कर्ज न लिया होता तो श्रीलंका से पहले भारत कभी का डूब गया होता। ये तो विदेशी कर्ज है और देशी कर्ज इससे कहीं ज्यादा है।

भारत में भी कई मुफ्त की योजनाएं चलायी जा रही हैं, इसलिए कुछ तथाकथित बुद्धिमानों का तर्क है कि ऐसे तो भारत में भी श्रीलंका जैसे हालात जल्दी ही पैदा हो जायेंगे यदि ये मुफ्त वाली योजनाएं और मेहनतकश जनता के लिये तरह-तरह की सब्सिडी बन्द ना हुई तो। मतलब एकदम साफ है कि भारत में राशन कोटे पर राशन, वृद्धावस्था, विकलांग पेंशन, अस्पताल में फ्री दवाई जैसी सारी योजनायें बन्द कर दी जाएं। जबकि मौजूदा सरकार 40 लाख करोड़ के बजट में से कल्याणकारी योजनाओं पर बमुश्किल तीन लाख करोड़ रूपये खर्च करती है जबकि इसका दस गुना से ज्यादा मुट्ठी भर पूंजीपतियों को लुटा दिया जाता है। मोदी कार्यकाल के पिछले साढ़े सात साल में 40 लाख करोड़ से ऊपर के कर्ज अपने पूंजीपति मित्रों के मांफ किये हैं और मेहनतकश जनता के ऊपर तीन लाख करोड़ खर्च इन तथाकथित राष्ट्रभक्तों के आंखों में गड़ता है। और यही कल्याणकारी योजनाएं डूबते को तिनके का सहारा बनी हुई हैं। इसी की वजह से बाजार की थोड़ी सी रौनक बनी हुई है और मौजूदा सरकार इसी ओर आगे बढ़ रही है। यकीन मानिये जिस दिन ये योजनाएं सरकार ने बन्द कर दिया उसके बाद हालात बद से बदतर हो जायेंगे। इसीलिये भारत का शासक वर्ग ये मुफ्त की योजनाएं बन्द नहीं कर रहा है।

मंदी के संकट के दौरान बड़े पूंजीपति लोग बैंकों का पैसा मारकर बैठ जाते हैं और ये पूंजीपतियों की दलाल सरकार उनके कर्ज को माफ कर देती है और ऊपर से बेलआउट पैकेज भी दे देती है। और इसके उलट मेहनतकश जनता से जबरदस्त वसूली की जाती है जिससे कर्ज के वसूली के दबाव में कई किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं और आत्महत्या भी कर लेते हैं। मेहनतकश जनता के पास जो रोजगार था वो छिन जाता है इस मंदी के दौर में, जिससे मेहनतकश जनता के पास आवश्यक सामान खरीदने तक की क्रय शक्ति नहीं बचती तो कर्ज कहाँ से दे पाएगी। इससे देशी और विदेशी कर्ज की किश्तों के ब्याज का बोझ बढ़ जाता है। धीरे-धीरे कर्ज की किस्तें भी अदा नहीं हो पाती हैं तो बैंक डूबने लगते हैं। तब किसानों आदि के कर्ज माफी के नाम पर सरकारी खजाने से बैंकों को विशेष रियायत पैकेज देकर भरा जाता है, मगर इससे भी ज्यादा समय तक राहत नहीं मिल पाती। तब बैंकों और बड़े-बड़े उद्योगपतियों को बेलआउट पैकेज दिया जाता है और मेहनतकश जनता से वसूली जारी रहती है। अपने इन्हीं पूंजीपतियों मित्रों को सरकार जनता की सार्वजनिक यूनिटों को घाटे में दिखाकर औने-पौने दाम में सरकारी संस्थाओं को बेच देती है और आखिर में श्रीलंका जैसा हाल होता है।

शेष आगे अगले भाग 9 में

Updated : 10 Jun 2022 8:55 AM GMT
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