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भारत श्रीलंका बनने की ओर अग्रसर : अन्तिम भाग- 10

India moving towards becoming Sri Lanka: Final Part-10

जाकिर हुसैन - 9421302699

3- अर्जेंटीना जब अचानक हो गया कंगाल- 2020 के जुलाई महीने में अचानक दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना कंगाली की कगार पर पहुंच गया। विदेशी निवेशक अपने निवेश किए बॉन्ड के 1.3 बिलियन डॉलर पूरे वापस मांगने लगे। बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने इस कर्ज को वापस करने से साफ हाथ खड़े कर दिए। अर्जेंटीना ने खुद के इस हालात के लिए अमेरिका को दोषी ठहरा दिया। लोगों के लिए महंगाई का सामना करना मुश्किल हो गया। साल 2001-02 में भी अर्जेंटीना दिवालियापन के हालात से जूझ चुका था। जैसे-तैसे इकोनॉमी के हालात संभले थे कि फिर स्थिति बिगड़ जाने से आम जनता के लिए रोजमर्रा के सामानों की महंगाई को झेलना मुश्किल हो गया।

4- 2012 के ग्रीस संकट ने जब लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया- पिछले दशक में इस दुनिया ने रातोरात ग्रीस को दिवालिया होते देखा। 2001 में अपनी करेंसी की जगह यूरो को अपनाने के बाद से ग्रीस की इकोनॉमी लगातार संकट में फंसती चली गई। सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़ने और लगातार बढ़ते सरकारी खर्च ने 2004 आते-आते सरकारी खजाना खाली होने लगा, जिससे 2004 में सरकारी खजाना कर्ज में डूब गया था। 2004 के एथेंस ओलंपिक के आयोजन के लिए किए गए 9 बिलियन यूरो का कर्ज लिया और इस कर्ज ने सरकार को महासंकट में फंसा दिया। इसके बाद साल 2008 से दुनिया में आई आर्थिक मंदी ने ग्रीस को कर्ज और महंगाई के जाल में फंसा लिया। लोगों के रोजगार छिन गए, शेयर बाजार क्रैश कर गया, पर्यटन स्थल बंद होने लगे, विदेशी पर्यटक और निवेशक दोनों देश से दूर हो गए। सरकार के पास न तो लोगों को राहत देने का कोई उपाय बचा और न ही कर्ज के जाल से मुक्ति की कोई राह बची। भुखमरी की कगार पर पहुंच गए लोगों को उस हालात से निकलने में कई साल लगे। यूरोपीय यूनियन (ईयू) से मिले बेलआउट पैकेज के जरिए घिसट-घिसटकर कई साल लगे ग्रीस में हालात को सामान्य होने में।

5- आइसलैंड के बैंक जब बन गए इकोनॉमी के लिए मुसीबत- 2008 में नॉर्डिक देश आइसलैंड के तीन बैंक 85 बिलियन डॉलर का कर्ज डिफॉल्ट कर गए। बैंकों के दिवालिएपन ने देश की इकोनॉमी को एकदम से हिला दिया। करेंसी के लिए संकट के हालात पैदा हो गए। लोगों के रोजगार छिनने लगे, लोन चुकाने में लोग फेल होने लगे, बाजार में बढ़ी महंगाई ने लोगों को मंदी के हालात से दो-चार करा दिया। 50 हजार से अधिक लोगों की सेविंग खत्म हो गई, दूसरी ओर रोजगार का संकट अलग से खड़ा हो गया। इस संकट की शुरुआत तब हुई थी जब उदारीकरण के फैसले के तहत प्राइवेट बैंकों को कई तरह की छूट दी प्राइवेट बैंकों ने कम गारंटी और आसान शर्तों पर लोगों को खूब लोन बांटा लेकिन 2008 की आर्थिक मंदी शुरू होते ही जब रोजगार का संकट पैदा हुआ तो लोगों की ओर से कर्ज वापसी बंद सी हो गई, ऐसे में एक-एक कर बैंक दिवालिया होते चले गए, लेकिन आइसलैंड ने एक कड़ा फैसला किया जिससे कई साल बाद फिर हालात संभलने लगे। आइसलैंड की सरकार ने जनता के टैक्स के पैसे से बैंकों को डूबने से बचाने की बजाय बैंकों को खुद इस हालात से निपटने को छोड़ दिया। इससे जनता पर नया बोझ नहीं आया और हालात साल 2013 आते आते संभलते दिखने लगे।

6- रूस-अमेरिका में भी आया आर्थिक संकट- रूस जैसा देश भी कंगाली की कगार पर आ गया था। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद कई सालों तक रूस पर लगातार कर्ज का बोझ बढ़ता गया और 1998 आते-आते दिवालिएपन के हालात पैदा हो गए। करेंसी का अवमूल्यन करना पड़ा यानी कीमत घटानी पड़ी। डिफॉल्ट की स्थिति आते ही एकाएक विदेशी मुद्रा भंडार को 5 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा, शेयर्स धड़ाम हो गए और शेयर बाजार क्रैश हुआ तो संभालने के लिए उसे बंद करना पड़ा. आम लोगों के लिए रोजगार लोन और जरूरी सामान जुटाने के हालात को संभालना मुश्किल होता चला गया. केवल रूस में नहीं इसका असर एशिया क बाजारों, अमेरिका, यूरोप और बाल्टिक देशों तक भी हुआ। अमेरिका में भी 1840 के दशक में नहर निर्माण के लिए सरकारों ने 80 मिलियन डॉलर तक का कर्ज लिया था। इससे वहां के हालात बिगड़ते चले गए और 19 राज्य कर्ज में डूब गए।

7- मेक्सिको में हालात और भी बुरे हो गये थे- 1994 में मैक्सिको की सरकार ने डॉलर के मुकाबले अपना करेंसी का 15 फीसदी तक अवमूल्यन किया। इससे हालात एकाएक बिगड़ गए। विदेशी निवेशकों में हलचल मच गई, वे अपना निवेश का पैसा मैक्सिको की मार्केट से वापस निकालने लगे, शेयरों को बेचने लगे। इस संकट में जीडीपी में 5 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई। देश को 80 बिलियन डॉलर तक का कर्ज लेना पड़ा। आईएमएफ कनाडा, अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देशों ने मेक्सिको के इस संकट से उबारने के लिए बेलआउट पैकेज दिया तब जाकर मैक्सिको और आसपास के देशों के आर्थिक संकट के हालात को संभालने में मदद मिली।

आज आप उपरोक्त आंकड़ो को देंखें तो निश्चित ही भारत की स्थिति श्रीलंका से कहीं दयनीय बनी हुई है और जल्द ही श्रीलंका की तरह सबको नंगी आँखो से नजर आने लगेगा। जिनको लगता है कि ये भारत है और श्रीलंका की स्थिति भारत से भिन्न है और यहाँ की जनता श्रीलंका की तरह सड़क पर नहीं उतरेगी तो अभी 2021 में भारत की जनता भारत सरकार और कारपोरट के विरुद्ध एक साल से ऊपर दिल्ली की सड़कों पर उतरी थी गाँधी नहीं भगत सिंह की अहिंसा के रास्ते पर चलकर सरकार को घुटने टेकने के लिये मजबूर किया। तब कुछ लोग कहते थे कि ये भाजपा सरकार है, इन धरना-प्रदर्शनों से कुछ होने वाला नहीं ये मोदी सरकार है झुकने वाली नहीं। ऐसे श्रीलंका में भी वहाँ के कुछ लोग कह रहे थे कि राजपक्षे नहीं तो कौन? ये राजपक्षे सरकार है, झुकने वाली नहीं। कुछ भी हो जाए जनता सड़क पर इस तरह नहीं उतरेगी। यदि उतरेगी तो पुलिस मार डंडे लाल कर देगी।

हमारे सोचने और चाहने से कुछ नहीं होता, जब तक कि भौतिक परिस्थितियां उस चीज के घटने की इजाजत ना दें। भारत के परिप्रेक्ष में इन भौतिक परिस्थियों का निर्माण हो चुका है तो आने वाले वर्षों में सबको श्रीलंका की तरह भारत में भी लोग सड़कों पर नजर आने लगेंगे।

अब ये आपको तय करना है कि हम किस ओर हैं आदमी के पक्ष में हैं या आदमखोर के पक्ष में….

Updated : 14 Jun 2022 8:27 AM GMT
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