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भारत श्रीलंका बनने की ओर अग्रसर : भाग- 7

India is on the way to become Sri Lanka: Part 7

जाकिर हुसैन - 9421302699


इस व्यवस्था के समर्थक कहते हैं कि श्रीलंका के दिवालिया होने के पीछे मुफ्तखोरी है! यानी वहाँ की सरकार जनता को जो सब्सिडी और मुफ्त का सामान (राशन, पेंशन, आवास, तेल, बिजली आदि) बाँटा है जनता को इसी वजह से सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ गया और वो बर्बाद हो गया। तो मेरा उन तथाकथित बुद्धिमानों से सीधा सा सवाल कि किसने ये मुफ्त वाला सामान माँगा था? कभी जनता ने इन मुफ्त योजनाओं के लिये सड़क पर उतरकर माँग किया? दरअसल इस तरह की व्यवस्था में सभी को रोजगार देने की क्षमता होती नहीं। उनके पास इतना रोजगार नहीं होता कि देश के सभी जनता को रोजगार दे सके। जनता रोजगार की मांगकर विद्रोह ना कर दे इसलिये रोजगार के बजाए ये ऐसी कई मुफ्त योजनाएं चलाते हैं और सारा दोष उलटा जनता पर ही मढ़ देते हैं। कुछ लोग सिर्फ सरकारों को ही सारा दोष दे देते हैं, जबकि इस मौजूदा राजपक्षे सरकार की जगह कोई दूसरी पार्टी की सरकार होती तो वो भी ऐसी ही मुफ्तखोरी जैसी योजनाएं चलाती। अब इस व्यवस्था को बचाने के लिये जनता और मौजूदा सरकार को ही दोषी करार देकर इस व्यवस्था को साफ बचा लेते हैं।

पूंजीवादी सरकारें रोजगार देने में असमर्थ होने के कारण वो ऐसी नीतियां लाती हैं, जिससे बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमखोरी…. जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं और इससे मुट्ठीभर लोगों का मुनाफा होता है और वो खुशहाल होते जाते हैं वहीं इसके उलट बहुसंख्यक जनता बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमखोरी…. से त्रस्त होकर त्राहि-त्राहि करने लगती है और इससे जनता की क्रयशक्ति बढ़ने के बजाए कम होती जाती है। इसलिये जनता की जेब में क्रय शक्ति ना हो पाने के कारण खरीददारी नहीं कर पाती जिससे बाजार में माल ठसाठस भरा रह जाता है, और आर्थिक मंदी (बाजार में माल ठसाठस भरा रहता है और जनता के जेब में माल को खरीदने के लिये पैसा ना हो तो आर्थिक मंदी आ जाती है।) आ जाने के कारण जनता की क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए कर्ज (होम लोन, कंज्यूमर लोन, बाईक लोन, कार लोन, किसान क्रेडिट कार्ड…. जैसे तमाम कर्ज) देती है। जिससे कुछ समय के लिये बाजार में रौनक आ जाती है और बाजार चलने लगता है मगर कर्ज और उस पर जबरदस्त सूदखोरी से पीड़ित जनता पहले से अधिक बर्बाद होने लगती है और फिर से धीरे-धीरे बाजार की रौनक जाने लगती है, जिससे सरकार बाजार का रौनक लाने के लिये तरह-तरह की सब्सिडी देती है जिससे सरकार पर राजकोषीय घाटा बढ़ने लगता है और सरकारें घाटे का बजट बनाती हैं और बजट घाटे को पूरा करने के लिए अतिरिक्त नोट छापती हैं और साथ में देशी-विदेशी कर्ज भी लेती हैं पर नोट छापने से मुद्रास्फीति (INFLATION यानी मुद्रास्फीति का अर्थ यह होता है, आपके रुपए मे उतार-चढाव। जब किसी अर्थव्यवस्था में सामान्य कीमत स्तर लगातार बढ़े और मुद्रा(आपका रुपया) का मूल्य कम हो जाए। यह एक ऐसा आकलन है जिससे बाजार में मुद्रा का प्रसार व वस्तुओ की कीमतों में वृद्धि या कमी की गणना की जाती है। उदाहरण के लिए- 2010 में एक सौ रुपए में जितना सामान आता था, और आज 2020 में उसे खरीदने के लिए दो सौ रुपये छाप दिये गये हैं तो माना जाएगा कि मुद्रा स्फीति शत-प्रतिशत बढ़ गई। यदि अर्थव्यवस्था में कीमत कुछ समय के लिए बढ़ती है और फिर कम हो जाती है और फिर दुबारा बढ़ती है तो हम इसे मुद्रास्फीति नहीं कहेगें। उत्पादित वस्तु के मूल्य के मुकाबले मुद्रा की कमी या अधिकता को मुद्रास्फीति कहते हैं। मान लीजिए किसी देश में सिर्फ कपड़े का उत्पादन होता है और कुल एक लाख मीटर कपड़ा उत्पादित करता है। उस एक लाख मीटर उत्पादित कपड़े का मूल्य एक लाख रुपया होता है जबकि उस कपड़े को खरीदने के लिए उस देश की सरकार डेढ़ लाख रुपया छाप देती है तो उत्पादन से अधिक मूल्य का रुपया छापने को मुद्रास्फीति का बढ़ना कहा जायेगा जबकि उत्पादन से कम मूल्य का रुपया छापने को मुद्रास्फीति का घटना कहा जायेगा। अब यहां सरकार ने पचास हजार रुपए जो ज्यादा छापे हैं इससे मुद्रास्फीति बढ़ती है, इससे महंगाई बढ़ जाती है क्योंकि उत्पादित सामान का मूल्य कम और मुद्रा ज्यादा तो महंगाई बढ़ेगी ही। इसी तरह से आप देश में उत्पादित सामान की कीमत और कुल सर्विस (सेवा) द्वारा कुल अंतिम मूल्य से ज्यादा रुपया छापेंगे तो निश्चित ही देश की मुद्रास्फीति बढ़ेगी और जितना ज्यादा रुपया छपेगा महंगाई बेलगाम होती जाएगी। जो कि वर्त्तमान में हो रहा है।) बढ़ जाती है जिससे मंहगाई बढ़ जाती है और अन्ततः हद से जायदा नोट छापने और कर्ज लेने पर श्रीलंका जैसी स्थिति हो जाती है।

शेष आगे अगले भाग 8 में

Updated : 9 Jun 2022 10:58 AM GMT
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