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अगर इतने ही कट्टर थे इस्लाम मानने वाले, तो सहअस्तित्व की संस्कृतिक बची कैसे रह गई?

If there were so many fanatics, then how did the culture of coexistence survive?

नफरत का एजेंडा

ज़ाकिर हुसैन - 9421302699

एक घटिया एजेंडा चलाया जा रहा है. बता रहे हैं कि 70 के दशक के पहले अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी संख्या थी. अब वहां अल्पसंख्यक नहीं है. इसकी वजह इस्लाम बताई जा रही है. अगर इस्लाम ही इसकी वजह है, तो फिर 70 के दशक के पहले कई शताब्दियों तक वहां अल्पसंख्यक कैसे बचे रहे? इस सवाल का जवाब एजेंडा चलाने वाले नहीं दे पाएंगे.

नॉम चॉम्स्की अपनी थ्योरी मैन्यूफैक्चरिंग कंसेट में जिक्र करते हैं कि पहले तो पश्चिम के मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स ने कम्युनिज्म का डर दिखाया और खूब मुनाफा कमाया. फिर कम्युनिज्म के अवसान के बाद उसको इस्लामिक चरमपंथ से रिप्लेस कर दिया गया. क्या ये सच बात नहीं है कि अमेरिका का तत्कालीन सुरक्षा सलाहकार एक हाथ में एके 47 और दूसरे हाथ में कुरान लेकर मुजाहिदीनों के पास पहुंचा था. दुनियाभर में एक योजना के तहत कट्टरता फैलाई गई थी.

भारत का ही इतिहास उठाकर देख लीजिए. अगर इतने ही कट्टर थे इस्लाम मानने वाले, तो सहअस्तित्व की संस्कृतिक बची कैसे रह गई? अगर सब कट्टर ही थे, तो इस लिहाज से दूसरे धर्म वाले लोग तो एक भी नहीं बचने चाहिए थे. क्या ये सच नहीं है कि इस्लामिक शासकों ने अपने प्रशासन में दूसरे धर्म के लोगों को बड़ी संख्या में जगह दी. क्या से सच नहीं है कि दूसरे धर्म के ग्रंथों और उनके प्रतीकों को अपने तौर तरीकों से संरक्षण दिया. हां, जब जरूरत पड़ी तो धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल किया.

लेकिन धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल क्या हिंदू राजाओं ने नहीं किया? बिल्कुल किया. ये उस समय के लिहाज से सामान्य बात थी. आप कहते हैं कि इस्लामिक शासकों ने तलवार के दम पर अपना साम्राज्य फैलाया. तो भाई, किसने नहीं फैलाया? क्या हिंदू राजा लूडो खेलते थे? समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन क्यों कहा जाता है? ये जो ईरान से लेकर बर्मा और सुमात्रा तक अखंड भारत का नक्शा दिखाते हैं, आपको क्या लगता है कि इन इलाकों तक साम्राज्य कैसे फैला होगा? इसके लिए खूनी लड़ाइयां लड़ी गई हैं. इन लड़ाइयों में वो सब हुआ, जिनकी बात कर आप एक समुदाय विशेष के खिलाफ अपना एजेंडा चलाते हैं.

याद रखिए कि आम मेहनतकश लोग कट्टर नहीं होते हैं. खासकर एक धर्म के लोग तो कतई नहीं हैं. अगर ऐसा होता, तो दुनिया बिल्कुल भी रहने की जगह नहीं होती. आम लोगों के जीवन की असुरक्षा का फायदा उठाकर उन्हें कट्टरता की ओर मोड़ा जाता है. ये काम 80 के दशक में शुरु किया गया. ऐसा संभव नहीं है कि जिस धर्म की नींव 1300 साल पहले पड़ी हो, वो अचानक से पिछले चार दशक में ही कट्टर हो जाए. लोगों को एक धूर्तता के तहत इस जहालत की तरफ मोड़ा जा रहा है और ये किसी भी धर्म के लोगों के साथ किया जा सकता है. म्यांमार के बौद्ध इसका ताजा उदाहरण हैं. रवांडा में हूतू और तुत्सी तो लगभग एक जैसी ईसाइयत फॉलो करते हैं, तो फिर वहां इतना बड़ा नरसंहार कैसे हुआ? श्रीलंका में तमिलों का नरसंहार मुसलमानों ने तो नहीं किया. सेब्रेनिका नरसंहार में तो मुसलमानों को ही मारा गया. नाजी जर्मनी की बर्बरता को किसने अंजाम दिया? मुसलमानों ने तो नहीं.

कट्टर किसी को भी बनाया जा सकता है. आज जो ये भीड़ फलाने काटे जाएंगे, राम-राम चिल्लाएंगे और ऐसे ही ना जाने कितने घटिया नारे लगा रही है और बस्तियों में सुनियोजित हमले कर रही है, वो इसी तरह की कट्टरता की शुरुआत है. आप भले ही अपनी आंखें मूदें रहें. जैसा कि पहले कहा, लोगों की असुरक्षा का फायदा उठाकर उन्हें कट्टर बनाया जा सकता है. ये काम किसी भी धर्म के लोगों के साथ किया जा सकता है. फायदे के लिए पॉवरफुल लोग इस कट्टरता को कभी कम नहीं होने देना चाहते. जो आम लोग उनकी इस चाल को समझते हैं, वो चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते क्योंकि वो असंगठित होते हैं.

बाकी तो आप अपना एजेंडा चलाते रहिए. इससे आपको तमाम तरीके के फायदे हो रहे होंगे. लेकिन फिर आपमें और लोगों को कट्टर बनाने वालों में कोई फर्क नहीं है. वो भी एक तरह का डर दिखाकर नफरत बेचते हैं और तुम भी.

Updated : 3 July 2022 5:01 AM GMT
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