Home > M marathi blog > हिन्दू-मुस्लिम एकता या मेहनतकशों की एकता

हिन्दू-मुस्लिम एकता या मेहनतकशों की एकता

Hindu-Muslim unity or unity of the working people

जाकिर हुसैन - 9421302699

राम मन्दिर के बाद रामनवमी पर दंगे फिर धार्मिक आधर पर बुलडोजर उसके बाद ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा अब फिर धर्म के आधार पर एक दूसरे के देवी-देवता/पैगम्बर पर निशाना साधकर हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा गरमाकर आपस में ही लड़ाया जा रहा है। जब तक मेहनतकश जनता इकट्ठा नहीं होगी, इन मेहनतकश जनता को आपस में लड़ाकर मारने का सिलसिला खत्म नहीं होगा। 1857 की क्रांति के बाद से ही शासक वर्ग ने हिन्दू-मुसलमानों को कभी भी एक नहीं होने दिया। जैसे ही एक होने का प्रयास करते हैं वैसे ही जनता को आपस में भिड़ा देते हैं ताकि फिर कभी 1857 जैसी क्रांति दोहराई ना जा सके।

आर्थिक समस्यायें जैसे-जैसे बढ़ती जाएंगी और जैसे-जैसे देश कंगाल होता जायेगा वैसे-वैसे जनता का ग़ुस्सा बढ़ेगा और मेहनतकश जनता सड़क पर उतरकर अपना गुस्सा जाहिर करेगी। जनता के सड़क पर उतरने से पहले ही शासक वर्ग जनता को जनता से हिन्दू-मुसलमान, गाय-गोबर-गंगा, भाषा, क्षेत्र, राष्ट्रवाद, रंग, नस्ल भेद…. में उलझाकर आपस में ही लड़ा देगी। शासक वर्ग हमेशा से यही नीति अपनाकर जनता को असल मुद्दे से भटकाकर अपने हितों के अनरुप फर्जी मुद्दा देकर भटका देती है।

हिन्दू-मुसलमान का खेल भारत में इस वक्त हिन्दू-मुसलमान मुद्दा काफी गरम है। शासक वर्ग को हमारी कमजोरियां पता है, इसलिये धर्म को आधार बनाकर हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर आपस में लड़ाकर दंगे करा रहा है। ये नुपुर शर्मा द्वारा दिया गया बयान और फिर उस बयान को भुनाने के लिये यह दंगा प्रायोजित किया गया। नुपुर शर्मा और नवीन जिंदल को 6 साल से पार्टी द्वारा निष्कासन एक दिखावा है भाजपा के अन्दर पहले से बड़ा कद बन गया है नुपुर शर्मा का। नुपुर शर्मा ने जो किया है उसका इनाम जल्द ही मिलेगा।

धर्म के नामपर लोग मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं? धर्म के आगे रोटी का सवाल क्यूँ बौना हो जाता है? चलिये इसकी पड़ताल करते हैं। अधिकांश आम लोगों को पता ही नहीं कि किस टीवी चैनल पर किस बहस के दौरान नुपुर शर्मा और बाकी प्रतिभागियों ने किसके खिलाफ क्या बोला था? प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों से आप जब यह सवाल करें तो बस यही जवाब देंगे कि बीजेपी वालों ने पैगम्बर मोहम्मद साहब का अपमान किया है। सबसे खास बात यह है कि बहस के दौरान नुपुर शर्मा द्वारा दिये गये बयान के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई और कई दिन बीतने के बाद ही विरोध प्रदर्शन हुए। जो कि सिद्ध करते हैं कि देश भर में दंगे प्रायोजित थे। शासक वर्ग द्वारा फैलाए गये जाल में लोग फंसाए गये हैं और हमें शोषक वर्ग आपस में लड़ाकर खुद सत्ता की मलाई खा रहा है।

शुरुवात कानपुर में थोड़े से पत्थरबाजी से होती है और इसके बाद शुक्रवार के नमाज के बाद देश के कई शहरों में यह आग फैल गया। इस पत्थरबाजी के लिए उकसाने में शासक वर्ग का हाथ है। आर एस एस और उसके सहयोगी कुछ कट्टर मुस्लिम संगठनों ने मेहनतकश जनता को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शासक वर्ग ने महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, मुनाफाखोरी, सूदख़ोरी…. जैसे मुद्दे दबाने के लिये इस अवसर को आपदा में अवसर की तरह इस्तेमाल किया।

जो आपत्तिजनक बात बीजेपी प्रवक्ता नुपुर शर्मा ने कही थी उस बयान का तथ्यपरक खण्डन कर मेहनतकश जनता को बताया जाता कि आज जो परम्परा है, और आज जो नैतिकता है वो डेढ़-दो हजार साल पहले या उससे भी पांच-दस हजार साल पहले की परम्परा और नैतिकता उस समय के हिसाब से ठीक थी पर आज के समय में नहीं। समय के हिसाब से नैतिकता शासक वर्ग के हितों के अनुसार बदलती रहती है।

अभी सौ साल पहले हमारे देश में 4-5 साल तक के बच्चों की भी शादी हो जाती थी। इसे अनैतिक नहीं माना जाता था। अगर हजारों साल पहले देखें तो बहुतों ने 9 साल की लड़की से शादी किया होगा, आज के समय जो पवित्र माने जाने वाले रिश्ते हैं, प्राचीन काल में वे रिश्ते भी पवित्र नहीं थे। आज की नैतिकता के हिसाब से उसका मूल्यांकन नहीं कर सकते। मामला धार्मिक हो तो उस पर सवाल उठाना और भी ग़लत है? प्राचीन काल की कई घटनाएं ऐसी हैं जो वर्तमान नैतिकता के हिसाब से गलत हो सकती है। ये नैतिकता भी शासक वर्ग के कानून के हिसाब से बदलता रहता है। अभी पिछले साल 2021 तक लड़कियों के लिये शादी की उम्र 18 साल थी और अब 21 साल हो गयी है। तो अब साल भर के अन्दर ही हमारी नैतिकता बदल गयी अब 21 से नीचे शादी करना गलत हो गया। आजादी से पहले क्या बाद में भी अभी 20 साल पहले तक खुलेआम बाल विवाह होते थे। आज भी देखें तो कईयों के दादा-दादी, नाना-नानी की शादी भी बहुत ही कम उम्र में हुई है, चाहे वो किसी भी जाति और धर्म का हो। उस वक्त तो शादी की उम्र ही निर्धारित नहीं थी। तो कम उम्र में शादी भी बहुत ही आम बात थी। जबकि ज्यादा उम्र में शादी करना गलत माना जाता था।

असल समस्या क्या है?

महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, मुनाफाखोरी, सूदख़ोरी…. जैसी समस्या जब भी बढ़ती है और इसको शासक वर्ग कंट्रोल करने में नाकाम रहता है तब शासक वर्ग जनता को जनता से लड़ाने के लिये धर्म का सहारा लेता है ताकि मेहनतकश जनता एक होकर महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, मुनाफाखोरी, सूदख़ोरी…. पर सवाल ना करें/प्रदर्शन ना करे, इसलिये अपने दलालों द्वारा ऐसे बयान दिलवाया जाता है या फिर ऐसे बयान दिये जाने के बाद इसको आपदा में अवसर की तरह इस्तेमाल कर अपने आईटी सेल द्वारा वायरल कराया जाता है और जनता के जज्बात भड़काकर उनके भावनाओं के साथ खेला जाता है। नतीजा आपके सामने मेहनतकश जनता का आपस में मारकाट और दंगे।

शोषक वर्ग के बहकावे में आकर, जनता जब यह मान लेती है कि उसके ऊपर होने वाला शोषण, दमन, अन्याय, अत्याचार, बलात्कार सब कुछ ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। जब शोषक वर्ग धर्म के नाम पर जनता को गुमराह करता है और धार्मिक उन्माद फैलाकर जनता को जनता से लड़ाता है और जनता भी शोषक वर्ग के बहकावे में आकर अपने रोजी-रोटी के सवाल भूल कर आपस में लड़ती है धर्म के नाम पर इंसानियत के खिलाफ लूटपाट आगजनी हिंसा बलात्कार पर आमादा हो जाती है।

शासक वर्ग धर्म के आधार पर मुसलमानों पर फर्जी वीडियो बनाकर अपने आईटी सेल द्वारा लोगों तक प्रचारित कर मुसलमानों के प्रति खुलेआम नफरत फैला रहे हैं। शासक वर्ग के लोग अपनी व्यवस्था को बचाए रखने के लिए दिन-रात जनता से झूठ बोल कर जनता को जनता से लड़ाते हैं गंदी फिल्में दिखाते हैं, नशाखोरी जुआखोरी, जमाखोरी, गुंडागर्दी को बढ़ावा देते हैं, अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं, धर्म की आड़ लेकर जनता के खिलाफ सारे कुकर्म करते हैं। भूख, महंगाई, बेरोजगारी, महंगाई…. के सवालों से जनता का ध्यान हटाने के लिए मंदिर मस्जिद के नाम पर दंगा-फसाद, मॉब-लिंचिंग, आगजनी, लूटपाट, बलात्कार आदि को बढ़ावा देकर यही लोग धर्म को बदनाम करते हैं।

धर्म एक निहायत ही निजी मामला है इसको राजनीति में नहीं घसीटना चहिए। धर्म मनुष्य के लिए बना है ना कि मनुष्य धर्म के लिए, और यह बात सभी धर्मों पर लागू होता है…. हम क्या खायें और क्या पहने, किससे शादी करें, किससे मोहब्बत करें, किस धर्म मे रहें, ये बताने का हक इन धर्म के ठेकेदारों को किसने दिया?

धर्म लोगों पर छोड़ देना चाहिए कि कौन किस तरह से रहे, कैसे रहे, कैसे इबादत/प्रार्थना/पूजा/अरदास.... करें, इसे व्यक्ति के ऊपर छोड़ दिया जाना चाहिए।

कुछ मुस्लिम सोचते हैं कि यदि सारे मुस्लिम एक हो जाएं तो इईंट का जवाब पत्थर से दिया जा सकता है। इसी प्रकार कुछ हिन्दू सोचते हैं कि यदि सारे हिन्दू एक हो जाएं तो इस समस्या का हल हो जाये। मगर ये दोनों ही तरीका ग़लत है। इन दंगों का जवाब ना ही मुस्लिम एकता और ना ही हिन्दू एकता से दिया जा सकता है क्योंकि एक के संगठित होने से दूसरे की एकता स्वतः ही मजबूत हो जायेगी और शासक वर्ग यही तो चाहता है। इसी विचार के आगे अधिकांश लोग सारी समस्या का समाधान हिन्दू-मुसलमान एकता के विकल्प के रूप में सोचते हैं, पर इस हिन्दू-मुस्लिम एकता से भी दंगों का इलाज नहीं हो सकता।

एक बारगी चलिये मान लेते हैं कि हमारे-आपके प्रयास से हिन्दू-मुस्लिम एकता कायम हो जाती है फिर शासक वर्ग अपने दलाल नेताओं या मठाधीशों/मौलानाओं/मुल्लाओं के जरिये ऐसे ऊल-जलूल बयानबाजी करा देगा या फिर मस्जिद में सुवर का मांस और मंदिर में गाय का मांस फेंकवा देगा। अब सैकड़ों साल से हमारे-आपके द्वारा किया गया हिन्दू-मुसलमान एकता के प्रयास पर मिनटों में पानी फिर जाता है। दंगों का इलाज सिर्फ और सिर्फ मेहनतकशों की क्रान्तिकारी एकता से ही होगा क्योंकि सभी धर्मों में दो वर्ग होते हैं एक शोषक और एक शोषित। सभी धर्मों में ठेकेदार हैं। क्या कभी आपने सोचा कि हर एक धर्म के ठेकेदार उस धर्म के अमीर यानी शोषक वर्ग के लोग ही क्यों बने हुए हैं? शोषक वर्ग हमेशा अपने फायदे के लिए धर्म का स्वयंभू ठेकेदार बन जाता है। धार्मिक दंगे कराने के लिए सीधे-साधे बेरोजगार जनता के दिमाग में धार्मिक कट्टरता भर देता है, इस प्रकार कानपुर, प्रयागराज, दिल्ली, मध्य प्रदेश, कर्नाटक…. जैसी घटना घट जाती है। फिर उस घटना को शासक वर्ग के हित में कैसे भुनाना है ये धर्म के ठेकेदार अच्छी तरह जानते हैं। भारत में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार…. चरम पर है, यंहा धर्म को कैसे मुद्दा बनाया जा रहा है यह देखना दिलचस्प है कि इस छोटी सी घटना को कहीं हिन्दु-मुसलमान के बड़े सांप्रदायिक दंगों मे ना तब्दील कर दें।

अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने दलालों के जरिए भारत का एक और टुकड़ा करना चाहता है। जैसे ब्रटिश साम्राज्यवाद ने अपने दलालों के माध्यम से ऐसे हालात पैदा कर दिये थे कि भारत के दो टुकड़े भारत और पाकिस्तान के रूप में हुए। हम आप बंदर की तरह चाहे जितनी कुलाचें मार लें अलग-अलग धर्मों की एकता या सभी धर्मों की एकता के रूप में समस्या सुलझने के बजाये और ही जटिल होती जायेगी। अब कोई कुछ भी कर ले, बिना क्रान्ति के देश नहीं बचेगा। तो हमें इस क्रांति के लिये मेहनतकशों की एकता के प्रयास में आगे बढ़ना पड़ेगा। पहल हम मेहनतकशों को ही करनी पडे़गी।

इंकलाब जिन्दाबाद! साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!

Updated : 19 Jun 2022 12:03 PM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top