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पूंजीवादी सत्ता में हिस्सेदारी मांगने वाले फासीवाद से मुकाबला कर सकते हैं क्या?

Can capitalists counter fascism seeking a share in power?

जाकीर हुसेन - 9421302699

मोदी सरकार के कुकृत्य का सही विश्लेषण करते हुए जब ऐतिहासिक भौतिकवाद के आधार पर भारत में वर्ग संबंधों के विकास का विश्लेषण किया जाएगा तो तमाम पूंजीवादी लोकतंत्र के हिमायती पार्टियों और उदारवादी बुद्धिजीवियों की पूंजीपरस्त विचार और मिज़ाज उभर कर सामने आ जाता है।

मोदी के खिलाफ इस तरह के लिबरल और पूंजी के समर्थक इतिहास के इस मोड़ पर लड़ाई को आगे नहीं ले जा सकते हैं। और जिस तरह से भारतीय संविधान के हिमायती बन दलितवादी तथा पिछड़ेवादी संपूर्णता में पूंजी की ही दलाली करने में अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं, वे भी बड़ी पूंजी के सबसे विश्वस्त पार्टी और नेता भाजपा तथा नरेंद्र मोदी के साथ समझौता करते ही दिख रहे हैं, ताकि सत्ता का एक छोटा सा टुकड़ा उन्हें प्राप्त हो जाए।

वर्तमान चुनाव के बाद जिस तरह से समाजवादी पार्टी और बसपा के तेवर ढीले पड़ गए है और उसके कुनबे के लोग भाजपा के साथ तालमेल बिठाने का जुगाड़ देख रहे हैं, इसने तय कर दिया है कि जो भी वामपंथी उनके साथ मिलकर के फासीवाद के खिलाफ संघर्ष करने का ख्वाब देखते हैं वे खुद को और जनवादी शक्तियों को धोखे में रख रहे हैं।

क्रान्तिकारी वामपंथियों को अपनी छोटी ताकत को आगे बढ़ाने के लिए मेहनतकशों तथा उत्पीड़ित समाज के बीच अपनी स्वतंत्र राजनीति के साथ जाना चाहिए न कि चुनावी गठबंधन को मुख्य आधार बनाकर चुनाव की राजनीति में डूब जाना चाहिए।

नरेंद्र कुमार

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Updated : 5 April 2022 3:31 PM GMT
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