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एक मुड़ा हुआ पन्ना: शहीद भगत सिंह और 'अछूत का सवाल‌'‌

A folded page: Shaheed Bhagat Singh and the question of 'untouchability'

जाकिर हुसैन - 9421302699


मुझे इससे बेहतर वाक्यांश दिख ही नहीं रहा ! बड़े जतन ‌से बनाई गई एक भावुक नौजवान की छवि के पीछे एक अध्ययनशील विचारक, सामाजिक समस्याओं पर जम कर कलम चलाने वाला लेखक और 1928 में अमृतसर से निकलने वाली पत्रिका कीर्ति के संपादक मंडल का सदस्य कहीं खो गया है !

एक मुड़ा हुआ पन्ना बन कर रह गया है उसका व्यक्तित्व, जिसे फांसी पर चढ़ने से पहले उसने बडी सावधानी से‌ मोड़ दिया था, लेकिन जिसे कभी पढ़ा ही नहीं गया, अमल में लाना तो‌ बहुत दूर की बात है !

उसके इंकलाब की भावना के पीछे एक मजबूत वैचारिक आधार भी है इसका सबूत तो असेंबली में नकली बम से धमाका कर अपनी बात आम लोगों तक पहुंचाने की उसकी योजना से ही मिल गया था. उनकी सामाजिक- राजनीतिक समस्याओं पर गहरी पकड़ भी थी, इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है.

तभी न, उसके बार बार कहने पर कि वह एक नास्तिक है, उसे जातीय, धार्मिक और भगवा रंग में रंगने की हर मुमकिन कोशिश की गई है!

अछूत का सवाल‌'‌ नामक यह लेख सम्पूर्ण भगत सिंह पीडीएफ पुस्तक से लिया गया है.

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काकीनाडा में 1923 में कांग्रेस-अधिवेशन में जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में आज की अनुसूचित जातियों को, हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बांट देने का सुझाव दिया था. हिंदू और मुस्लिम अमीर लोग, इस वर्गभेद को पक्का करने के लिए पैसा देने को भी तैयार थे. उसी के जवाब में लिखा गया था यह लेख, जो 1928 में कीर्ति में प्रकाशित हुआ !

एक बात और. बाबा साहेब लंडन से पढ़ाई पूरी करके जब लौटे भगत सिंह अपने लेखों और भाषणों के जरिए अछूतों के लिए युद्ध की शुरूआत कर चुके थे !

पेश है शहीद भगत सिंह का ऐतिहासिक दस्तावेज :

हमारे देश जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए..यहां अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं. एक अहम सवाल अछूत-समस्या है.

समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में, जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा! उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज हो उठेंगे! कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआं अपवित्र हो जाएगा!

ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं, जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है.

हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं, जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलाने वाला यूरोप, कई सदियों से इन्कलाब की आवाज उठा रहा है. उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी.

आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटा कर क्रांति के लिए कमर कसी हुई है. हम सदा ही आत्मा- परमात्मा के वजूद को लेकर चिन्तित होने तथा इस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा? वे वेद-शास्त्र पढ़ने के अधिकारी हैं अथवा नहीं?

हम उलाहना देते हैं कि हमारे साथ विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता. अंग्रेजी शासन हमें अंग्रेजों के समान नहीं समझता, लेकिन क्या हमें यह शिकायत करने का अधिकार है?

सिंध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर मुहम्मद ने, जो बम्बई कौंसिल (Council) के सदस्य हैं, इस विषय पर 1926 में खूब कहा-

वे कहते हैं कि 'जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इन्कार करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते, तो तुम्हें क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकारों की मांग करो? जब तुम एक इन्सान को समान अधिकार देने से भी इन्कार करते हो तो तुम अधिक राजनीतिक अधिकार मांगने के अधिकारी कैसे बन गए?'

बात बिल्कुल खरी है. लेकिन क्योंकि यह बात एक मुस्लिम ने कही है इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो, वह उन अछूतों को मुसलमान बना कर अपने में शामिल करना चाहते हैं!

जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया-बीता समझोगे तो वह जरूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे, जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, जहां उनसे इन्सानों-जैसा व्यवहार किया जाएगा. फिर यह कहना कि देखो जी, ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं, व्यर्थ होगा.

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कितना स्पष्ट कथन है, लेकिन यह सुन कर सभी तिलमिला उठते हैं. ठीक इसी तरह की चिन्ता हिन्दुओं को भी हुई. सनातनी पण्डित भी कुछ-न-कुछ इस मसले पर सोचने लगे. बीच-बीच में बड़े 'युगांतरकारी' कहे जानेवाले भी शामिल हुए. पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय- जोकि अछूतों के बहुत पुराने समर्थक चले आ रहे हैं- की अध्यक्षता में हुआ, तो जोरदार बहस छिड़ी. अच्छी नोंक-झोंक हुई. समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञोपवीत धारण करने का हक है अथवा नहीं? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने का अधिकार है?

बड़े-बड़े समाज-सुधारक तमतमा गये, लेकिन लालाजी ने सबको सहमत कर दिया तथा यह दो बातें स्वीकृत कर, हिन्दू धर्म की लाज रख ली; वरना जरा सोचो, कितनी शर्म की बात होती !

कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है. हमारी रसोई में निःसंग फिरता है, लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है.

इस समय पंडित म. मो. मालवीय जी जैसे बड़े समाज-सुधारक, अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या, पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किये बिना, स्वयं को अशुद्ध समझते हैं! क्या खूब यह चाल है!

सबको प्यार करने वाले भगवान की पूजा करने के लिए मन्दिर बना है, लेकिन वहां अछूत जा घुसे, तो वह मन्दिर अपवित्र हो जाता है! भगवान रुष्ट हो जाता है!

घर की जब यह स्थिति हो तो बाहर हम बराबरी के नाम पर झगड़ते अच्छे लगते हैं क्या? तब हमारे इस रवैये में कृतघ्नता की भी हद पाई जाती है.

जो निम्नतम काम करके, हमारे लिए सुविधाओं को उपलब्ध कराते हैं, उन्हें ही हम दुरदुराते हैं. पशुओं की हम पूजा कर सकते हैं, लेकिन इन्सान को पास नहीं बिठा सकते!

आज इस सवाल पर बहुत शोर हो रहा है. उन विचारों पर आजकल विशेष ध्यान दिया जा रहा है. देश में मुक्ति कामना जिस तरह बढ़ रही है, उसमें साम्प्रदायिक भावना ने और कोई लाभ पहुंचाया हो अथवा नहीं, लेकिन एक लाभ जरूर पहुंचाया है - अधिक अधिकारों की मांग के लिए अपनी-अपनी कौमों की संख्या बढ़ाने की चिन्ता सबको हुई. मुस्लिमों ने जरा ज्यादा जोर दिया. उन्होंने अछूतों को मुसलमान बना कर अपने बराबर अधिकार देने शुरू कर दिए. इससे हिन्दुओं के अहम को चोट पहुंची. स्पर्धा बढ़ी, फसाद भी हुए.

धीरे-धीरे सिखों ने भी सोचा कि कहीं हम पीछे न रह जाएं! उन्होंने भी अमृत छकाना आरम्भ कर दिया. हिंदू-सिखों के बीच अछूतों के जनेऊ उतारने या केश कटवाने के सवालों पर झगड़े हुए. अब तीनों कौमें अछूतों को अपनी-अपनी ओर खींच रही है. इसका बहुत शोर-शराबा है.

उधर ईसाई चुपचाप उनका रुतबा बढ़ा रहे हैं; चलो, इस सारी हलचल से ही देश के दुर्भाग्य की लानत तो दूर हो रही है!!

इधर जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं तथा उन्हें हर कोई अपनी-अपनी खुराक समझ रहा है तो (उन्होंने सोचा) वे अलग ही क्यों न संगठित हो जाएं?

इस विचार के अमल में अंग्रेजी सरकार का कोई हाथ हो अथवा न हो, लेकिन इतना अवश्य है कि इस प्रचार में सरकारी मशीनरी का काफी हाथ था.

'आदि धर्म मण्डल' जैसे संगठन उस विचार के प्रचार का परिणाम हैं.

अब एक सवाल और उठता है कि इस समस्या का सही निदान क्या हो? इसका जबाब बड़ा अहम है.

सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इन्सान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से. अर्थात् क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं.

इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे. साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि "यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है.."

अब क्या हो सकता है? चुपचाप दिन गुजारो!

इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग, उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए, लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया! मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया. आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया. बहुत दमन और अन्याय किया गया. आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है.

इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी हो गयी. लोगों के मनों में आवश्यक कार्यों के प्रति घृणा पैदा हो गई. *हमने जुलाहे को भी दुत्कारा. आज कपड़ा बुननेवाले भी अछूत समझे जाते हैं. यू.पी. की तरफ कहार को भी अछूत समझा जाता है. इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई. ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रुकावटें पैदा हो रही हैं.

इन तबकों को अपने समक्ष रखते हुए हमें चाहिए कि हम न इन्हें अछूत कहें और न समझें. बस, समस्या हल हो जाती है.

नौजवान भारत सभा तथा नौजवान कांग्रेस ने जो ढंग अपनाया है, वह काफी अच्छा है.* *जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा, उनसे अपने इन पापों के लिए क्षमायाचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा इन्सान समझना, बिना अमृत छकाए, बिना कलमा पढ़ाए या शुद्धि किए, उन्हें अपने में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना, यही उचित ढंग है. और आपस में खींचतान करना और व्यवहार में कोई भी हक न देना, कोई ठीक बात नहीं है.

जब गांवों में मजदूर-प्रचार शुरू हुआ, उस समय किसानों को सरकारी आदमी यह बात समझा कर भड़काते थे कि.."देखो, यह भंगी-चमारों को सिर पर चढ़ा रहे हैं और तुम्हारा काम बंद करवाएंगे."

बस किसान इतने में ही भड़क गए! उन्हें याद रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नहीं सुधर सकती जब तक कि वे इन गरीबों को नीच और कमीन कह कर अपनी जूती के नीचे दबाए रखना चाहते हैं. अक्सर कहा जाता है कि वह साफ नहीं रहते. इसका उत्तर साफ है- क्योंकि वे गरीब हैं! गरीबी का इलाज करो. ऊँचे-ऊँचे कुलों के गरीब लोग भी कोई कम गन्दे नहीं रहते. गन्दे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएं बच्चों का मैला साफ करने से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं!

लेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता, जितने समय तक कि अछूत कौमें अपने आपको संगठित न कर लें. हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की मांग करना बहुत आशाजनक संकेत हैं. या तो साम्प्रदायिक भेद को झंझट ही खत्म करो, नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो.

*कौंसिलों और असेम्बलियों का कर्तव्य है कि वे स्कूल-कालेज, कुएं तथा सड़क के उपयोग की पूरी स्वतन्त्रता उन्हें दिलाएं. जबानी तौर पर ही नहीं, वरन साथ ले जाकर उन्हें कुओं पर चढ़ाएं. उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाएं, लेकिन जिस लेजिस्लेटिव में बालविवाह के विरुद्ध पेश किए बिल तथा मजहब के बहाने हाय-तौबा मचाई जाती है, वहां वे अछूतों को अपने साथ शामिल करने का साहस कैसे कर सकते हैं?*

इसलिए हम मानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों. वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें.

हम तो साफ कहते हैं कि 'उठो,अछूत कहलानेवाले असली जनसेवको तथा भाइयो! उठो! अपना इतिहास देखो. गुरु गोविन्दसिंह की फौज की असली शक्ति तुम्हीं थे! शिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सब कुछ कर सके, जिस कारण उनका नाम आज भी जिन्दा है. तुम्हारी कुर्बानियां स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं. तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोतरी करके और जिन्दगी संभव बना कर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो, उसे हम लोग नहीं समझते.

लैण्ड-एलियेनेशन एक्ट के अनुसार, तुम धन एकत्र कर भी जमीन नहीं खरीद सकते. तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती हैं-

"उठो, अपनी शक्ति पहचानो.* संगठनबद्ध हो जाओ. असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा."

Those who would be free must themselves strike the blow.

स्वतन्त्रता के लिए स्वाधीनता चाहने वालों को यत्न करना चाहिए.

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इन्सान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो उनके मातहत हैं, उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है.

कहावत है- 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते!'अर्थात् संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो. तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा. तुम दूसरों की खुराक मत बनो. दूसरों के मुंह की ओर न ताको. लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झांसे में मत फंसना. यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है.

यही पूंजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है; इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना. उसकी चालों से बचना. तब सब कुछ ठीक हो जायेगा.

तुम ही असली सर्वहारा हो...

संगठनबद्ध हो जाओ. तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी, बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी. उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो. धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा.

सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए, कमर कस लो. तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो.

सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो.

भगत सिंह

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Updated : 25 March 2022 4:00 PM GMT
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