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क़र्ज़दार को निश्चित तिथि में क़र्ज़ वापस कर देना चाहिए क़र्ज़ देने वाले को भी कुछ छूट क़र्ज़दार को देना चाहिए

The borrower should pay back the loan within the stipulated date lender should also give some rebate to the borrower

क़र्ज़दार को निश्चित तिथि में क़र्ज़ वापस कर देना चाहिए    क़र्ज़ देने वाले को भी कुछ छूट क़र्ज़दार को देना चाहिए
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क़र्ज़दार को निश्चित तिथि में क़र्ज़ वापस कर देना चाहिए

क़र्ज़ देने वाले को भी कुछ छूट क़र्ज़दार को देना चाहिए


------------- डॉ एम ए रशीद , नागपुर

7798727277

9371945556

ब्याज पर क़र्ज़ के लेनदेन का हर कहीं जाल बिछा हुआ है , ब्याज के साथ लोग क़र्ज़ दे रहे हैं । परेशान लोग ही अपनी समस्याओं के समाधान के लिए क़र्ज़ लेते हैं लेकिन उन्हें क़र्ज़ का ब्याज कितना भारी पड़ जाता है कि मूल रकम अदा होने का नाम नहीं लेती बल्कि क़र्ज़ पर क़र्ज़ का बोझ बढ़ता चला जाता है। आखिर क़र्ज़दार के बारे में बहुत कुछ सुनने और पढ़ने में आता है कि कर्ज़ अदा नहीं होने पर उसने अपनी ईह लीला समाप्त कर ली। जबकि कहीं ऐसा भी होता है कि कर्ज़ू की राशि से कहीं अधिक ब्याज दे दिया जाता है फिर भी क़र्ज़ देने वाला उसे माफ नहीं करता । बिना ब्याज क़र्ज़ लेनदेन के लिए महाराष्ट्र में बहुत सी सोसायटियां चल रही हैं । उनमें से एक नागपुर शहर में "समाधान को ऑपरेटिव सोसाइटी" भी है । यह सेंट्रल एवेन्यू , सेवा सदन के शब्बानी क्लब चौक पर स्थित है ।


कर्ज़ के संबंध में हमें बहुत सी सावधानियां बरतने की आवश्यकताएं हैं । इस संबंध में हज़रत अबु राफ़े रज़ि ब्यान करते हैं कि प्रेषित हज़रत मोहम्मद सअव ने एक युवा उम्र का ऊंट किसी से क़र्ज़ लिया । फिर आप सअव के पास सदक़े के कुछ ऊंट आए तो हज़रत अबु राफ़े रज़ि कहते हैं

कि आप प्रेषित हज़रत मोहम्मद सअव ने मुझे आदेश दिया उस आदमी का युवा उम्र का ऊंट का क़र्ज़ वापस कर दो । मैंने कहा इन ऊंटों में सिर्फ एक ऊंट है जो बहुत अच्छा है 7 साल का है। आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फ़रमाया वही उसको दे दो इसलिए कि बेहतरीन आदमी वह है जो बेहतरीन तरीके से क़र्ज़ अदा करता हो ।

इस हदीस में जो मामला ब्यान किया गया है वह यह है कि पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक व्यक्ति से क़र्ज़ के रूप में नौजवान ऊंट लिया था । फिर उसके बाद जब पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास बैतूलमाल में सदके के ऊंट आए तो उनमें से एक ऊंट जो उसी आयु का होना चाहिए उसको अदा करने के लिए , बैतूलमाल के सुपरवाइजर सहाबी को आदेश दिया कि ऊंट उस व्यक्ति को वापस कर दिया जाए जिस से क़र्ज़ लिया था । बैतूलमाल के सुपरवाइजर सहाबी अबु राफ़े रज़ि इस उम्र का कोई ऊंट बैतूलमाल में तो नहीं देखा नहीं मौजूद है किस तरह उसका क़र्ज़ वापस किया जाए। पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा उससे बेहतर जो ऊंट है वही वापस कर दो।


इस घटनाक्रम में जो बातें इस हदीस से हमें मालूम होती हैं उसमें सबसे पहली बात यह कि पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बेहतरीन तरीके से क़र्ज़ अदा करने वाले थे । आपने जिस तरह का क़र्ज़ लिया था उसी तरह का क़र्ज़ वापस करने की कोशिश की , लेकिन जब वह उपलब्ध नहीं था तो उससे बेहतर चीज़ क़र्ज़ में वापस कर दी । इस से यह बात साबित होती है के सबसे पहले तो इंसान को यह कोशिश करनी चाहिए कि जितना क़र्ज़ लिया है उतना ही वापस करे । उससे कम वह वापस नहीं कर सकता । और अगर वह अपनी खुशी से देना चाहे तो जितनी रकम उसने क़र्ज़ में ली है उससे अधिक भी दे सकता है । क्योंकि पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जीवनी से हमें यह बात मालूम होती है। यह कोई दशा नहीं है जो दिल दिमाग में बनी रहे लेकिन यह ब्याज में नहीं है । क्योंकि यहां पर क़र्ज़ लेने वाला अपनी खुशी से वह अधिक रकम क़र्ज़ देने वाले को वापस कर रहा है । और दूसरी चीज़ यह कि कर्ज़ देने वाले को भी देते वक्त क़र्ज़ की अधिक राशि वसूल होने की नीयत का मुतालबा नहीं करना चाहिए । असल नियत और मुतालबा उसी चीज का होना चाहिए जितनी राशि उसने कर्ज में दी है । दूसरी बात जो हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस हदीस के आखिर में बयान की है कि बेहतरीन व्यक्ति वे हैं जो बेहतरीन तरीके से क़र्ज़ को वापस करते हैं ।


इस तरह से इसमें हमें कई तरह के नैतिक गुण मिलते हैं जिन से अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन से वे लोग हैं जो बेहतरीन तरीके से क़र्ज़ वापस करने वाले होते हैं। सबसे पहली चीज़ निश्चित समय पर क़र्ज़ को अदा करना होता है । दूसरी बात कि अगर कर्ज़दार निश्चित समय पर कर्ज़ वापस नहीं कर पा रहा हो तो उस व्यक्ति तो वह क़र्ज़ लेने वाले से कुछ और समय के लिए अपनी बात रखे । यह न हो कि क़र्ज़ देने वाला उसके पीछे जाता रहे अपनी राशि की मांग करता रहे और इन सब के बाद वह कहे मेरी यह मजबूरियां और कारण हैं , इस वजह से आपको क़र्ज़ वापस नहीं कर पा रहा हूं। इस समय उसका निश्चित समय बढ़ाने की बात क़र्ज़ लेने वाले को करना चाहिए कि वह निश्चित समय पर क़र्ज़ अदा देगा । कर्ज़ अदा करने में बिना कारण टालमटोल नहीं करना चाहिए । बावजूद इसके कि कर्ज़दार के पास में राशि है और वह क़र्ज़ अदा नहीं कर रहा तो वह बेहतरीन क़र्ज़ अदा करने वालों की लिस्ट में शामिल नहीं होगा।

निर्धारित समय पर क़र्ज़ की अदायगी संभव नहीं है तो अल्लाह का डर रखते हुए क़र्ज़ लेने वाले से निश्चित तारीख में ढील मांगी जाना चाहिए।

यह भी सर्वश्रेष्ठ बात है कि क़र्ज़ देने वाला अगर उसे छूट देता है तो अल्लाह उसे महान पुण्य अता फरमाएगा ।

यदि क़र्ज़ लेने वाला क़र्ज़ दिए बगैर मर जाता है तो कयामत के रोज़ उसकी नेकिया क़र्ज़ देने वाले के खाते में चली जाएंगी । और अगर नेकिया ना होंगी तो क़र्ज़ देने वाले की बुराइयां क़र्ज़ देने वाले के खाते में डाल दी जाएंगी।


चौथी बात यह कि कर्ज़ देने वाले को निश्चित समय सीमा से पहले ही कर्ज़ वापस कर देना चाहिए । क़र्ज़ देने वाले के लिए अल्लाह से दुआ करना चाहिए कि अल्लाह इसके माल में और बरकत नसीब फरमा । पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ऐसा ही किया करते थे ।संभव हो तो क़र्ज़ देने वाले को अपनी ओर से खुशी से कुछ ज़्यादा दे देना चाहिए । ऐसा मामला हमारे समाज में दिखाई नहीं देता । पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब की इन बातों को जिंदा करने की कोशिश करना चाहिए। वैसे तो शरियत की दृष्टि से क़र्ज़ नहीं लेना चाहिए । जब तक बगैर कर्ज़ के गुजारा हो सकता है । क़र्ज़ लेने से परेशानियों में बढ़ोतरी हो जाती है ।

अल्लाह का हुक्म है जब क़र्ज़ का लेनदेन होने लगे तो उसे लिख लिया करो । इस संबंध में ज़बान के वादे पर निर्भर नहीं रहना चाहिए । कर्ज़ लेने में नियत साफ रखना चाहिए । अगर ऐसा है तो अल्लाह कर्ज अदा करने में कोई सूरत निकाल देता है । पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि जिसने किसी से क़र्ज़ लिया और उसे अदा करना चाहा तो तो अल्लाह तआला क़र्ज़ अदा करने की स्थिति पैदा कर देता है ।

अगर कर्ज़दार की नियत खराब है तो ऐसा व्यक्ति अल्लाह की अदालत में चोर के रूप में पेश किया जाएगा।


क़र्ज़ की अदायगी पर कुदरत हासिल करने के लिए पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की जीवनी से बहुत ही प्रेरणादायक बात मिलती है कि एक दिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मस्जिद-ए-नबवी में तशरीफ लाए तो हज़रत अबू उमामा रजि मस्जिद में तशरीफ रखे हुए थे ‌। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा की नमाज़ के वक्त के अलावा मस्जिद में मौजूद होने की क्या वजह है ? हज़रत अबू उमामा ने कहा कि ग़म और कर्ज़ों ने घेर रखा है । कर्ज़ अदायगी के संबंध में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक दुआ सिखाई जिस की बरकत से अल्लाह ग़म और क़र्ज़ को दूर कर देता है ।

कर्ज लेने से पहले खूब सोच समझ लेना चाहिए कि हम क़र्ज़ अदा कर सकते हैं कि नहीं । वरना क़र्ज़ लेकर परेशानियां बढ़ाती चली जाती हैं और हमारा समाज ऐसा की वह ब्याज भी नहीं छोड़ता और मूल रकम बनी की बनी रहती है।

रमजान के महीने में रोज़ेदार दान दक्षिणा करके कर्ज़दारों के ग़मों और कर्ज़ों को दूर करने का प्रयास करते रहते हैं । उनके बहुत से प्रयास सफल भी हुए हैं । क़र्ज़ देने वालों ने मूल रकम लेकर उनका पूरा ब्याज माफ कर दिया जो बहुत सराहनीय कार्य माना जाना चाहिए ।

Updated : 2022-04-13T14:46:03+05:30
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