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दुर मस्जिद से होने का बेहद है गम, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम..

दुर मस्जिद से होने का बेहद है गम, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम..
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जाकीर हुसैन

मस्जिदो मे नमाजो को जा ना सके, अपने रुठे खुदा को मना ना सके..

इतने बेबस है हम माहे रमजान मे भी, एक जुमा तक भी हम कर अदा ना सके..

जिंदगी भर रहेगा हमे इसका गम, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम..

बच्चे बुढे जवा सबही मजबुर है, भुखे लाखो यहा मरते मजदूर है..

पास मे ना है जर ना है रकम, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम..

कैसे कपडे बनाऐगा अबके कोई, कैसे खुशिया मनाऐगा अबके कोई..

हर बशर गम मे यारो बहोत चुर है, घर से बाहर ना जाऐगा अबके कोई..

इस वबा से निकलने लगे सबके दम, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम..

ये खुशी हम हमेशा मनाते रहे, हम सेवईया ये खाते खिलाते रहे..

जाते थे घुमकर दोसतो के यहा, और उनको भी घर पर बुलाते रहे..

इस कोरोना ने ढाया है ऐसा सितम, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम..

अपणी गलती कि हमको मिली है सजा, आज नाराज है हमसे मेरा खुदा..

नाम सुन कर के जिसका सभी डर रहे, सारे आलम मे फैली है ऐसी वबा..

सोचते-सोचते है मेरी ऑखे नम्, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम..

दर्द ए दिल कि दवा है तुही ऐ खुदा, मेरा हाजत रवा है तुही ऐ खुदा..

सुन ले दिल कि सदा खतम कर दे वबा, मेरा मुशकिल कुशा है तुही ऐ खुदा..

हम गुनेहगारो पे कर दे इतना करम, इस बरस ईद कैसे मनाऐगे हम...

Updated : 17 May 2020 8:12 PM GMT
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