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शहीद अहमद यार ख़ां (र.अ.) देश के लिये जान देना पसंद किया लेकीन माफी नही मांगी

Shaheed Ahmed Yar Khan (RA) liked to give his life for the country but did not apologize

स्वतंत्रता सेनानी➡️2️⃣5️⃣6️⃣ : हिन्दुस्तान से मुहब्बत करने वाले देशवासियों की जानों के कुर्बान होने का सिलसिला एक लम्बे समय तक चलता रहा। बड़ी हिम्मत और चाहत की बात थी,कि ख़ुद ज़िन्दा रहें या न रहें लेकिन वतन की आबरू बाक़ी रहे और आज़ादी मिल

कर रहे। सच तो यह है कि जो क़ौमें अपनी नसलों और देश को दुनिया में सम्मानजनक तरीक़ो से ज़िन्दा रखना चाहती हैं, उनमें से

ज़िन्दगियां निछावर करनी ही पड़ती हैं। बाद में आनेवाली पीढ़ियों पर यह निर्भर करता है कि वे अपने शहीदों की मंशा और उनके जज़्बात का कितना ध्यान रखते हैं या उनको सिरे से ही भुला देते हैं।

शहीद अहमद यार ख़ां (र.अ.)भी क़ौम प्रेमी, देश प्रेमी ऐसे ही एक शहीदे वतन थे। वह

अपने देश हिन्दुस्तान को आज़ाद कराने के बाद क़ौम पर पनपता देखना चाहते थे। वह नस्ल से अफ़ग़ानी पठान थे। अपने परिवार के

साथ 1857 से और बहादुरी के कारण रियासत रामपुर के नवाब द्वारा उनके परिवार वालों को

फ़ौज में नौकरियां दे दी गई थीं। अहमद यार ख़ां (र.अ.)को भी शाहजहाँपुर की तहसील

का तहसीलदार बना दिया गया था।

वह अंग्रेज़ों के हिन्दुस्तान पर क़ब्ज़े के सख्त विरोधी थे। इसी कारण वह अंग्रेज़ों से नफ़रत करते थे। वह चाहते थे कि किसी भी तरह से अंग्रेज़ों को भारत से मार भगाया जाए। देश में जहां एक जुटता के साथ आज़ादी के दीवाने अंग्रेज़ों के पैर उखाड़ रहे थे, वहीं दश्मन के हाथों देश के बिके हुए कुछ बड़े एवं छोटे लोग

अंग्रेज़ों को मदद पहुंचा कर उन्हें देश में जमने का मौक़ा दे रहे थे। यदि जुट हो कर अंग्रेज़ों का विरोध करता तो इस देश का न तो लम्बे समय तक शोषण हो पाता, न इतना ज़्यादा ख़ून ख़राबा होता और न ही फ़िरंगी इतनी लूट-मार कर

पाते। उसके कारण जो कुछ भी रहे हों आज़ादी के चाहने वाले देश प्रेमियों ने अपना फ़र्ज़ निभाया।

स्वतंत्रता सेनानी अहमद यार ख़ां

(र.अ.)ने 1857 में आज़ादी की पहली लड़ाई के

समय अंग्रेज़ शासन को बहुत नुक़सान पहुंचाया। गोरों की सेना, फ़तेहगढ़ और फ़र्रुखाबाद के रास्ते गंगा नदी को पार कर जलालाबाद को अपने क़ब्ज़े में लेना चाहती थी। अहमद यार ख़ां (र.अ.)को इस फ़िरंगी साज़िश का पता चल गया। वह इस बात को आसानी के साथ बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। वह भी अपनी वतन प्रेमी

फ़ौज को लेकर वहां पहुंच गए। उन्होंने अंग्रज़ी सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया।दोनों ओर से हमले शुरू हो गए। वार पर वार हो रहे थे, लड़ाई ख़ौफ़नाक रूप लेती जा रही थी। अहमद यार ख़ान (र.अ.)की फ़ौज अपने ईमान की ताक़त से देश पर कुर्बानहो रही थी। साथ ही उनकी फ़ौज ने दुश्मन के बहुत से सैनिकों को बिचोरिया घाट

पर ही क़त्ल कर डाला था। अंग्रेज़, अहमद यार ख़ां (र.अ.) और उनकी सेना की बहादरी

तथा मार-काट से घबरा उठा। यदि चंदेल राजपूत, अहमद यार ख़ां (र.अ.) को मौक़े पर

मदद पहुंचा देते तो अंग्रेज़ सेना को वहां से नाकाम भागना पड़ता या उनका ठिकाना गंगा नदी की मुहं फाड़े हुई लहरें बनतीं। देश से मुहब्बत करने वालों के मुक़द्दर में तो फ़िरंगियों के जुल्म व सितम सहना, उनके फांसी के फन्दों पर झलनाऔर उनकी जेलों की काल कोठरियों को आबाद करना था। ऐसा ही हुआ भी कि

किसी देशद्रोही ने बहादुर अहमद यार ख़ां (र.अ.)

की मुख़बिरी कर उन्हें गिरफ़्तार करा

दिया। इस तरह वह अंग्रेज़ों से जंग हार गए, मगर हिम्मत नहीं हारी। भारत के सपूत

अहमद यार ख़ां (र.अ.)को जलालाबाद की नज़दीकी फ़ौजी छावनी में ले जाया गया।

अब क्या था, ज़ालिम अंग्रेज़ उन पर ज़ुल्म करने की योजना बनाने लगे। गोरों की

अदालत में उस वतन प्रेमी पर मुक़द्दमा चला कर फांसी की सज़ा का हुक्म जारी कर दिया गया। उस समय के अधिकांश देश प्रेमियों का अंत या तो अंग्रेज़ी बन्दकों की गोलियां हुआ करती थीं या बेरहम फांसी के फन्दे अथवा फ़िरंगी, मज़ा लेने के लिए जिस तरह भी उन्हें सता-सता कर मारना चाहें, वे इसके लिए आज़ाद थे।

अहमद यार ख़ां (र.अ.)तो पहले से ही समझते थे कि अंग्रेज़ों की फ़ौज के बढ़ते हुए

सैलाब को रोकने का नतीजा अपनी मौत को ख़ुद ही गले लगाना है, फिर भी देश प्रेमी ऐसे हालात में ख़ामोशी से बैठना भी ज़िल्लत की मौत मरना समझते थे। उस बहादुर ने देश की आज़ादी के बदले फांसी की सज़ा मंज़ूर कर ली। इसी बीच एक अंग्रेज़ फ़ौजी अफसर ने उनसे सवाल कर डाला-क्या तुम अपनी जान बख़्शवाने

के लिए माफ़ी मांगना कुबूल करते हो? क्यांकि तुम एक बहादुर हो। वीर अहमद यार ख़ां (र.अ.)

के दिल को फ़िरंगियों से माफ़ी मांगना किसी तरह भी गवारा नहीं था।

उन्होंने उस फ़ौजी अफसर के प्रस्ताव को ठुकराते हुए कह दिया कि यह हरगिज़

नहीं हो सकता।उस समय अंग्रेज़ अपनी ताक़त और हुकूमत के नशे में अपनी किसी भी बात

पर "न" सुनना पसंद ही नहीं करते थे। अहमद यार ख़ां (र.अ.)का माफ़ी मांगने से

इनकार कर देना भी अंग्रेज़ अफ़सर ने अपनी बेइज़्ज़ती समझा। भारत के उस

बहादुर सपूत को ख़त्म करने के लिए ज़ालिमों ने एक नई योजना तैयार की।

*उन्होंने अहमद यार खां को एक बोरे में ज़िन्दा बंद करवाया। उस बोरे को जलालाबाद के करीब आम के पेड़ पर एक बड़ी रस्सी के सहारे लटकवा दिया गया।* रस्सी का एक सिरा अंग्रेज़ों के हाथ में ही रहा। अब उन ज़ालिम अंग्रेज़ों ने बोरे से बन्धी रस्सी को खींच-खींच कर छोड़ना शुरू किया। जब भी वह रस्सी को खींच कर छोड़ते तो बोरे में बंद अहमद यार ख़ां (र.अ.)

उस बोरे समेत ज़ोर से ज़मीन पर गिरते। इस तरह बार-बार तो उनको ज़मीन पर पटकने की प्रक्रिया को निरंतर जारी रखा गया। वह मासूम, बोरे में

बंद इस जुल्म की तकलीफ़ को कब तक सहन कर सकता था। यहां तक कि उन्हें इसी तरह पटक-पटक कर शहीद कर दिया गया।

आख़िर सोचिए तो ज़रा, ज़ुल्म की कोई सीमा है। उस वफ़ादार, देश प्रेमी,

आज़ादी के मतवाले शहीद अहमद यार ख़ां (र.अ.)ने मरते वक़्त भी कितने अमानवीय

व्यवहार सहे, जिन्हें सुन कर आत्मा कांप उठती है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं, आंखें नम हो जाती हैं।अब उस महान हस्ती का कोई नाम लेवा भी नहीं। इस युग के देश प्रेमी ज़रा अपने दिलों पर हाथ रख कर सोचें। आख़िर कहां खो गए वे वीर सपूत? आज न तो उनकी यादें हैं और न ही बातें हैं? क्या उनकी कहानियां केवल हवाओं में उड़ाने,

दरियाओं में बहाने और धरती में दफ़नाने के लिए ही हैं: देश के ऐसे बहादुरों के बलिदानों की कहानियों से भी वर्तमान इतिहास को संजोए और संवारे जाने की ज़रूरत है, ताकि उनकी अमर गाथाओं से आज़ादी की क़ीमत को पहचाना जा

सके।


संदर्भ 1) -हिंदुस्तान की जंगे आज़ादी के मुसलमान मुजाहिदीन

लेखक -मेवराम गुप्त सितोरिया, , किताबदार, मुम्बई,

1988 एव 2012, पृष्ठ 57.

2) जंग ए आजादी और मुसलमान

लेखक खालिद मोहम्मद खान

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संकलक - अताउल्ला खा रफिक खा पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र

9423338726

Updated : 7 Jun 2021 5:28 PM GMT
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