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4 मे शहीद दिवस ! स्वतन्त्रता संग्राम के महान यौद्धा टिपू सुलतान रहमतूल्लाह अलयही

Martyr's Day on 4th! Great warrior of freedom struggle Tipu Sultan Rahmatullah Alaihi

4 मे शहीद दिवस ! स्वतन्त्रता संग्राम के महान यौद्धा टिपू सुलतान रहमतूल्लाह अलयही
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जाकीर हुसेन - 9421302699

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20 नवंबर, 1750 को कर्नाटक के देवनहल्ली में जन्मे टीपू सुल्तान (र.अ.)का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शहाब (र.अ.)था।उनके पिता का नाम हैदर अली (र.अ.)और उनकी माँ का नाम फातिमा फक्रुन्निसा था। उनके पिता मैसूर साम्राज्य के सिपाही थे लेकिन अपनी ताकत के कारण वह 1761 में मैसूर के शासक बन गए। इतिहास में, टीपू सुल्तान (र.अ.)को न केवल एक योग्य शासक और योद्धा के रूप में देखा जाता है, बल्कि एक विद्वान के रूप में भी देखा जाता है।उनके पिता हैदर अली (र.अ.)वह उनकी बहादुरी से प्रभावित हुए और उन्हें शेर-ए-मैसूर की उपाधि दी।टीपू सुल्तान (र.अ.)को दुनिया का पहला मिसाइल मैन माना जाता है। बीबीसी के अनुसार, टीपू सुल्तान (र.अ.)के पास लंदन के प्रसिद्ध विज्ञान संग्रहालय में रॉकेट हैं। ये रॉकेट 18 वीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजों द्वारा लिए गए थे।कई युद्धों में टीपू की हार के बाद, मराठों और निज़ाम ने अंग्रेजों के साथ एक संधि की। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेजों से संधि का प्रस्ताव रखा। वैसे, अंग्रेज भी टीपू की ताकत को समझते थे, इसलिए वे भी एक गुप्त समझौता चाहते थे। मार्च 1784 में दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई, जिसके परिणामस्वरूप मैंगलोर की संधि हुई।

टीपू ने 18 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ अपना पहला युद्ध जीता था।पलक्कड़ किल्ला को टीपू का किला के नाम से भी जाना जाता है। यह पलक्कड़ शहर के केंद्र में है। इसे 1766 में बनाया गया था। किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत एक संरक्षित स्मारक है।अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हैदर अली की मृत्यु और टीपू सुल्तान की ताजपोशी मैसूर की एक बड़ी घटना है। दूसरी ओर, टीपू ने अपनी बहादुरी और कूटनीति के बल पर मैसूर का बचाव करने की ठानी। वास्तव में, 18 वीं शताब्दी के अंत में, टीपू सुल्तान एक महान शासक थे, जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से भगाने की कोशिश की थी। पिता हैदर अली के बाद 29 दिसंबर 1782 को

टीपू सुल्तान को मैसूर के सिंहासन पर बैठाया गया।अपने पिता की तरह, वह एक बहुत ही कुशल कमांडर और एक चतुर राजनयिक थे, इसलिए वह हमेशा अपने पिता की हार का बदला अंग्रेजों से लेना चाहता था, अंग्रेज उनसे डरते थे। अंग्रेजों ने नेपोलियन को टीपू सुल्तान की आकृति में देखना शुरू किया। वह अपने पिता के समय प्रशासनिक सेवा और युद्ध को संभालने वाली कई भाषाओं के प्राध्यापक थे, लेकिन उनकी हार की सबसे बड़ी मौत उनकी फ्रांसिसकॉन्स पर भरोसा था। वह स्वभाव से धार्मिक थे, फिर भी उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को एक नजर से देखा। इस्लाम में गहरी आस्था के कारण, वे दिन में 5 बार नमाज अदा करते थे, रमजान का उपवास करते थे, और एक भक्त के रूप में मस्जिद जाते थे। जब उसने तुर्क सरकार से सैनिकों की माँग करने के लिये कॉन्स्टटिनोपल को वकील भेजा तब यूफ्रेट्स से नजफ तक पानी की नहर बनाने और पीने का पानी उपलब्ध कराने की अधिकारियो को चेतावनी दी थी ।

कैबिनेट में कोई हिंदू-मुस्लिम भेद नहीं किया

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महाराज पूर्णय्या, मीर सादिक, बदरुजमान खान उनके राजनीतिक सलाहकार थे। हैदर अली के समय से पूर्णिया कैबिनेट में हैं।हैदर अली का अंधविश्वासी आदमी। श्रीनिवासराव और आपाजीराम भी हैदर के अनादिकाल से, वकील और राजदूत ऐसी भूमिकाएँ निभाते रहे हैं। कृष्णराव सुल्तान के वित्त मंत्री थे। मूलचंद और सुजनराय दोनों को टीपू सुलतान ने दिल्ली में मुगल दरबार के वकील के रूप में भेजा था। नागप्पा एक फौजदार के रूप में कूर्ग के प्रभारी थे। उन्होंने बैंगलोर का बचाव किया था।शिवाजी नाम के एक प्रमुख को 300 घुड़सवार सेना के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था।

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मंदिर को दिए गए उपहार और भेंट

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श्रृंगेरी के स्वामी के साथ उनका घनिष्ठ संबंध था। वह बहुत वफादार थे। टीपू सुल्तान ने महाचंडी जप को आर्थिक मदद दी थी जो उनके लिए चल रहा था।भोजन के लिए आवश्यक बर्तन खाना बनाने की सामुग्री सुल्तान ने अपने खजाने से दिए थे। मेलुकोटा के नारायणस्वामी मंदिर को 11 हाथी और उन्होंने सुवर्णलंकर-जवाहिर भेट दि थी।असंख्य मंदिर को सोने चांदी भेंट मे दि गई और भूमि दान दि गई।

कांचीपुरम के मंदिर गोपूर बांधणे को हैदर अली के कार्यकाल में सुरुवात हुई थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वह काम अधूरा रह गया था। टीपू सुल्तान ने वो काम पूरा किया।

श्रीरंगपटना के रंगनाथ को दान दिया। जब टीपू सुल्तान ने जंग के लिये जाते तो उनकी सफलता के लिए जाप किया जाता था।

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परिवहन के लिए सड़कों का निर्माण

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सुल्तान ने अपने राज्य में कई सड़कों का निर्माण किया। मालाबार तट पर सभी परिवहन नाव से होते थे; लेकिन सुल्तान, ने वह समुद्र किनारे के समानांतर अंदर तक पक्की सडके बनवायी । इससे व्यापार को गति मिली। उस रूट पर गाडीया चलने लगीं। उन्होंने घाट के रास्ते में भी सुधार किया। इस मार्ग पे भोजनालय खोले और वो हिंदु भाई को चलाने को दिये थे।

यातायात और भोजन की सुविधा प्राप्त होने से लोगों और व्यापारियों की भीड़ बढ़ गई। उन्होंने कई झीलें और बांध बनाए। तालाब बनाने के लिए उन्होंने झीलों को साफ रखने के लिए लोगों को काम पर रखा, लोगों से जमीनें खरीदीं और बदले में उन्हें इनाम दिया।*

युद्धसामग्री का शोधकर्ता

उसे युद्धसामग्री का गहन ज्ञान था। शोधकर्ता की बुद्धि भी थी। उसने कई हथियारों में थोड़ा अपने हिसाब से बदलाव किया था। वह इसके बारे में सोचता रहा और इसका नतीजा यह हुआ कि उसने जो रॉकेट बनाए, वे 4 फुट ऊंचे बांस के सहारे लगे थे। एक तरफ पाइप बंद रहता था।उसे 1 पाउंड बारुद से भरा एक उसे प्रज्वलित किया जाता था । जब प्रकाश दिया जाता है, तो पाइपलाइन हवा में उड़ जाती है और इसकी नीली रोशनी गिर जाती है, और फिर यह 1000 गज तक जाकर गिरती थी और दुश्मन को जला कर राख कर देती थी ।

बैंगलोर में तारामंडल पेठ इस हथियार कारखाने के लिए टीपू सुल्तान द्वारा आरक्षित किया गया था। वहां उन्होंने एक प्रयोगशाला भी खोली थी। ये पाइपलाइन अलग अलग आकार की बनायि जाती थी। नतीजतन, उनकी उड़ान अलग थी। इन रॉकेटों को उड़ाने के लिए सैनिकों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया था। रॉकेटों को एक सटीक कोण पर बांस पर रखा जाता था, इस बात पर निर्भर करता है कि वे कितनी दूर गिरे और इसके बाद उसे उडाया जाता था। जब टीपू की मृत्यु हुई, तो अंग्रेजों ने सभी रॉकेट को एकत्र किया और अपने युद्धसामग्री मे जमा किया। इसमे कुछ और सुधार बाद इन रॉकेटों को अपने बाद के युद्धों में इस्तेमाल किया। इन रॉकेटों का इस्तेमाल अंग्रेजों ने 1812 में नेपोलियन के खिलाफ युद्ध में किया था। *सुल्तान कभी भी अंग्रेजों के साथ युद्ध में जाने से नहीं हिचकिचाया और अंग्रेजों से कभी पीछे नहीं हटे। उन्हें युद्ध के मैदान में टीपू सुल्तान (र.अ.) मे अपणो से ही धोखा दिया गया था, इसलिए वे 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टन में युद्ध के मैदान में शहीद हो गए। इस महान योद्धा की रक्त रंजित लाश को देखकर, लॉर्ड हॉर्स ने राहत के साथ दहाड़ते हुए कहा,आज भारत हमारा हो गया है।

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संदर्भ- 1)THE IMMORTALS

लेखक syed naseer ahmed

मो. 94402 41727

2) स्वतन्त्र लढ्यातील मुस्लिमांचे योगदान

लेखक -सोमनाथ देशकर

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संकलन तथा अनुवादक लेखक अताउल्ला खा रफिक खा पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र

9423338726

Updated : 4 May 2022 3:54 AM GMT
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