Home > About Us... > शहिद ए वतन क्रांतिकारी मौलाना अहमदुल्लाह शाह मदरासी (र.अ.)

शहिद ए वतन क्रांतिकारी मौलाना अहमदुल्लाह शाह मदरासी (र.अ.)

Martyr A. Homeland Revolutionary Maulana Ahmadullah Shah Madrasi (RA)

स्वतंत्रता सेनानी➡️2️⃣5️⃣2️⃣ : मौलाना अहमदुल्लाह शाह मदरासी (र.अ.)उर्फ दिलावर जंग साहेब की पैदाइश सन् 1787 में

चिन्नयापट्टन (मद्रास) में हुई थी। आपके वालिद सैय्यद मोहम्मद अली चिन्नयापट्टन के नवाब थे। आपने इस्लामी तालीम और दीनी तरबियत व सिपाहगिरी का इल्म

अपने मुकामी उस्तादों से हासिल किया और जब फारिग हुए तो आपकी तबियत रियासती कामों में नहीं लगी। आपने अपने वालिद से इजाज़त ली और अंग्रेज़ हुकूमत के खिलाफ़ मैदाने-जंग में उतर गये।

आप टीपू सुल्तान की शहादत के वाक्ये से ही अंग्रेज़ों के मुखालिफ जेहन बना चुके थे। चूंकि उस वक्त अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ वहां कोई महाज़ नहीं था इसलिए आप पहले हैदराबाद गये जहां से जयपुर, ग्वालियर,टोंक होते हुए दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में जंगे-आज़ादी के हेडक्वार्टर पर आपको मालूम हुआ कि आगरा में अंग्रेजों ने हिंदू मुसलमानों पर बहुत जुल्म किया है । मस्ज़िदों

में नमाज़ियों को जाने नहीं देते हैं। बगैर किसी वजह के सजाएं दी जाती हैं। आपने फौरन आगरा जाने का फैसला किया और आगरा पहुंचकर मुस्लिम अवाम में

तबलीग और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का माहौल पैदा किया। आपकी शख्सियत का इतना असर हुआ कि बहुत कम वक्त में आपके साथ अवाम का हुजूम इकट्ठा होने लगा। जिन मस्ज़िदों में 20 या 25 लोग नमाज़ पढ़ने को जाते थे वहां अब मस्जिदें भरने लगीं । मस्ज़िद में नमाज़ के बाद आप अपनी तकरीर से मुसलमानों

को अंग्रेज़ों के खिलाफ जेहाद के लिए तैयार करते। अब आगरा का मौजूदा दौर बदल चुका था, अब आप कहीं चलते तो आपके काफिले के आगे डंका बजा

करता था और आपके साथ मुरीदों की एक बड़ी जमात चला करती थी।

अंग्रेज़ अफ़सरान परेशान तो थे, लेकिन अवाम में आपकी मकबूलियत को देखते हुए

गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे।

वहां आपके करीब के कुछ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया और आपके बारे में जानकारी चाही लेकिन किसी से कुछ भी राज हासिल न कर सके। इसी दौरान

दिल्ली में आपकी ज़रूरत महसूस की गयी और आपको दिल्ली जाना पड़ा; वहां से

मुरादाबाद और फिर बरेली में अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़े। आपकी हिम्मत और ताकृत के साथ साथ जंगी तैयारी से अंग्रेज़ फौज घबराती थी । उसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि मुरादाबाद की जंग में एक तरफ आप मोर्चा सम्भाले थे तो दूसरी तरफ

बर्तानवी हुकूमत का कमाण्डर इन चीफ हिन्ट कॉलन केम्बल था जिसे आपने शिकस्त दी थी। अंग्रेज़ भी आपकी बहादुरी का लोहा मानते थे।

अंग्रेज़ राइटर सर थामस स्टेंस ने आपके बारे में लिखा था कि मौलवी अहमदुल्लाह शाह बहुत खुद्दार बुलन्द हौसले के मालिक के साथ-साथ एक बेहतरीन सेनापति थे। इसके बाद आपने शाहजहांपुर में भी अंग्रेजों के छक्के छुडा दिये थे। आप दौराने-जंग महाज़ पर घायल हुए और शाहजहांपुर के पास मौज़ागंज लाये गये जहां 5 जून सन् 1858 को शहीद हुए। आपकी शहादत के बारे में

इतिहासकारों ने तारीख़ तो यही लिखी है लेकिन यह भी लिखा है कि आप 5 जून सन् 1858 को लड़ते हुए शहीद हुए। इसकी तसदीक नहीं हो पायी है। लेकिन

आपकी मज़ार मौज़ागंज (शाहजहांपुर) में आज भी है जहां आपके कुछ माननेवाले हर

साल उर्स किया करते है।

संदर्भ- 1)लहू बोलता भी है

लेखक -सय्यद शाहनवाज अहमद कादरी,कृष्ण कल्की

▪️▪️▪️▪️▪️▪️▪️▪️▪️

संकलक- अताउल्ला खा रफिक खा पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र

9423338726

Updated : 31 May 2021 4:06 AM GMT
Tags:    
Next Story
Share it
Top