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आजादी_का_अमृत_महोत्सव। भारत की आजादी : दारुल उलूम, रेशमी रूमाल आन्दोलन, और जमीयत उलेमा ए हिंद

Independence_Ka_Amrit_Festival. India's Independence: Darul Uloom, Reshmi Rumal Movement, and Jamiat Ulema-e-Hind

आजादी_का_अमृत_महोत्सव। भारत की आजादी : दारुल उलूम, रेशमी रूमाल आन्दोलन, और जमीयत उलेमा ए हिंद
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#आजादी_का_अमृत_महोत्सव।

भारत की आजादी : दारुल उलूम, रेशमी रूमाल आन्दोलन, और जमीयत उलेमा ए हिंद

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1857 के स्वतंत्रता संग्राम विभिन्न कारणों के आधार पर असफल रही और स्वतंत्रता के मुतवल्लीयो पर हौलनाक अत्याचार के पहाड़ तोड़ डाले गए। उनमें मुसलमान और बतौर खास उलेमा, अंग्रेजों के सितम का निशाना बने, इसलिए कि उन्होंने सरकार मुसलमानों से छीनी थी और उलेमा-ए-किराम ने उनके खिलाफ फतवा देकर जिहाद की घोषणा आम कर दिया था।


इसलिए 1857 से चौदह साल पहले ही गवर्नर जनरल भारत ने यह कह दिया था कि मुसलमान मूल रूप से हमारे विरोधी हैं।

🟢 इस लड़ाई में दो लाख मुसलमानों को शहीद किया गया जिनमें साढ़े इक्यावन हजार उलेमा थे।

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🟣अंग्रेज उलेमा-ए-किराम के इतने दुश्मन थे कि दाढ़ी और लंबे कुर्ते वालों को देखते ही फांसी दे देते थे। एडवर्ड टामसन ने गवाही दी है कि सिर्फ दिल्ली में पांच सौ उलेमा ए किराम को फांसी दी गई (रेशमी रूमाल स: 45)

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🔵पूरी दिल्ली को मक़्तल में तब्दील कर दिया गया था मिर्ज़ा ग़ालिब की भाषा में

चौक जिसे कहे वह मक़्तल है

घर नमूना बना है जिन्दा का

शहर दिल्ली का जर्रा जर्रा खाक

तशना ए खून है हर मुसलमान का

दिल्ली, कोलकाता, लाहौर, बम्बई, पटना, अंबाला, इलाहाबाद, लखनऊ, सहारनपुर, शामली और देश के चप्पे चप्पे में मुसलमान और अन्य पीड़ित भारतीयों के शव नजर आ रही थीं

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🟤उलेमा-ए-किराम को जीवित सुअर की खाल में सी दिया जाता, फिर जला दिया जाता था। कभी उनके बदन पर सुअर की चर्बी मल दी जाती फिर जिंदा जला दिया जाता था। (देखिए ईस्ट इंडिया कंपनी और विद्रोही उलेमा)

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📕 दारुल उलूम देवबंद कि स्थापना


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इस युद्ध में विफलता का मुख्य कारण फौजियों और हथियारों की कमी और संगठन की कमी थी। इसलिए अकाबिर देवबंद ने विचार-विमर्श के बाद देवबंद में 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना की। इस का उद्देश्य जहां इस्लामी शिक्षा था, वहीं देश की आजादी के लिए फौजी और संग्रामी लोगों की तैयारी भी थी, जो राष्ट्र और देश का नेतृत्व कर सकें, स्वतंत्रता संग्राम को सफलतापूर्वक मंजिल तक पहुँचा सकें।

📘तो दारुल उलूम के पहले छात्र जो फ़राग़त के बाद दारुल उलूम में शिक्षक और अध्यक्ष पद से नवाजा गया, उन्होंने एक मौका पर कहा:


🟢"हज़रत मौलाना कासिम नानोतवी रहमतूल्लाह अलयही

ने इस मदरसे को क्या ज्ञान की प्रसार और शिक्षा के लिए स्थापित किया था? मदरसा मेरे सामने स्थापित हुआ। जहां तक मैं जानता हूँ 1857 / के युद्ध की विफलता के बाद यह योजना स्थापित किया गया। ताकि कोई ऐसा केंद्र स्थापित किया जाए, जिसके छत के नीचे लोगों को तैयार किया जाए, ताकि 1857 /के नुकसान भरपाई की जा सके "(पत्रिका दारुल उलूम अंक जमादी सानी 1372 हिजरी)

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🔵मालूम हुआ कि देश की सेवा और उसको स्वतंत्रता से हम किनार करने का जुनून दारुल उलूम देवबंद की स्थापना के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। साथ ही जो मदरसे दारूल उलूम के राह पर बाद में स्थापित किए गए उनके स्थापना के उद्देश्यों में भी एक महत्वपूर्ण लक्ष्य यह रहा है कि ऐसे रिजाल कार और व्यक्तियों को तैयार किए जाएं जो देश के निर्माण और विकास में असर अंदाज़ रोल अदा कर सकें। तो देश के निर्माण और विकास के लिए व्यापक रूप से संघर्ष के लिए अकाबिर दारूल उलूम देवबंद ने जमीअत उलेमा हिंद स्थापित किया। जो दारूल उलूम का राजनीतिक शाखा था।

जमीयत के कार्यकर्ताओं ने जनता में जागरूकता की लहर बनाने और स्वतंत्रता के लिए माहौल अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

🔴 जमीयत ने कांग्रेस से भी पहले "क्वाइट इंडिया" "भारत छोड़ो" की मांग अपने प्रस्ताव के द्वारा किया, मौलाना अबुल कलाम आजाद रहमतूल्लाह अलयही ने जमीयत और कांग्रेस के मंच से, और मौलाना मोहम्मद अली जौहर रहमतूल्लाह अलयही

और मौलाना हसरत मोहानी आदनीने स्वतंत्रता के लिए जो सेवाएं प्रदान की है वे दिन की रोशनी की तरह स्पष्ट हैं।

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📙 रेशमी रूमाल आन्दोलन (Silk Letter Movement)

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यहाँ क्रांतिकारी हज़रत शेखूल हिंद मौलाना महमूद हसन साहब

रहमतूल्लाह अलयही ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर जो स्वतंत्रता आंदोलन पैदा की थी, इस पर रोशनी डालना उचित होगा यह आंदोलन रेशमी रूमाल के नाम से मशहूर हुई।

1857 / युद्ध की विफलता के बाद देश की आजादी के लिए यह वैश्विक आंदोलन शुरू किया गया था। पहले हजरत शेखूल हिंद

रहमतूल्लाह अलयही ने उलेमा ए देवबंद को लेकर एक संगठन समरतूत तर्बियह स्थापित फिर जमीयत उल अंसार की स्थापना की और इसके तहत उलेमा को कनेक्ट किया और उन्हें संगठित और प्रशिक्षित किया गया। इनमें में काबुल और सूबा सरहद के उलेमा भी थे।

हज़रत सैयद अहमद शहीद

रहमतूल्लाह अलयही के आंदोलन के प्रभाव वहाँ बाकी थे। हज़रत शेख हिंदरहमतूल्लाह अलयही

ने इसी क्षेत्र को अपने आंदोलन का केंद्र बनाया, कार्यक्रम था कि इस क्षेत्र को जोश ए जिहाद से परिपूर्ण कर दिया जाए और अफगानिस्तान की सरकार को प्रेरणा दिया जाए कि वे भारत के स्वतंत्रता सेनानियों का सहयोग करे। और तुर्की सरकार से संपर्क कर उसे तैयार किया कि वह भारत में ब्रिटिश सरकार पर हमला कर दे। और अंतर्देशीय विद्रोह और क्रांति की आग भड़कादी जाए और अंदरुनी और बाहरी यूरिश से मजबूर होकर ब्रिटेन भारत छोड़ने पर मजबूर हो जाए। इसके लिए हजरत शेखुल हिंद रहमतूल्लाह अलयही

ने अंतर्देशीय दिल्ली, लाहौर, पानीपत, दीनपूर, जयपुर, अमरूत, कराची, ढाका आदि को केंद्र बनाया। मिशन की सफलता के लिए बर्मा, चीन, फ्रांस और अमेरिका प्रतिनिधिमंडलों को रवाना किए और उनकी समर्थन प्राप्त की। मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी रहमतूल्लाह अलयही

को आपने काबुल में रहकर सेवा करने का आदेश दिया और खुद हिजाज शरीफ तशरीफ़ ले गए ताकि वहां खिलाफत उस्मानिया के अधिकारियों से मिलकर जहन साजी की जाए और तुर्की को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हमला के लिए आमंत्रित किया जाए। तो हज़रत ने गवर्नर गालिब पाशा से मुलाकात की, उसने पूरा सहयोग किया। और तुर्की के प्रधानमंत्री अनवर पाशा से भी मदीना में हज़रत शेख हिंद रहमतूल्लाह अलयही की मुलाकात हुई और तुर्की के प्रधानमंत्री ने अपने मदद का आश्वासन दिया। इस आंदोलन में मौलाना सिंधीरहमतूल्लाह अलयही एक रेशमी रूमाल से एक गुप्त पत्र बनवाया था इसलिए उसका नाम रेशमी रूमाल आंदोलन पड़ गया।

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🟡इस आंदोलन के सदस्यों और सहयोगियों में हज़रत शेख हिंद

रहमतूल्लाह अलयही अलावा मौलाना हुसैन अहमद मदनी, (रह.अ) मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी,(रह.अ)

हाजी तरंग ज़ई, मौलाना अबुल कलाम आजाद, (रह.अ)

मौलाना अब्दुर रहीम राय पूरी, (रह.अ);मौलाना खलील अहमद सहारनपुर (रह.अ);

, मौलाना सादिक कराची , खान अब्दुल गफ्फार खां सरहदी, मौलाना अहमद अली लाहौरी, (रह.अ);मौलाना हसरत मोहानी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, (रह.अ);मौलाना एजरा गुल, मौलाना बरकत उल्लाह भोपाल, और ग़ैर मुस्लिम सदस्यों में राजा महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ मथुरा सिंह, ए पी आचार्य आदि शामिल थे। आंदोलन का रहस्य खुल जाने और हज़रत शेख हिंद (रह.अ)

के गिरफ्तार हो जाने के कारण आंदोलन सफल होते-होते रह गई। लेकिन आंदोलन से हिन्दू-मुस्लिम एकता के साथ आजादी की लड़ाई लड़ने की मजबूत बुनियाद कायम हो गई।

🟢हज़रत शेखुल हिंद (रह.अ) की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने गांधी जी की खिलाफत कमेटी और जमीअत उलेमा हिंद के मंच और फंड से पूरे देश का दौरा कराया और एक साथ स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने का फैसला किया गया।

मौलाना हुसैन अहमद मदनी रहमतूल्लाह अलयही


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📗इस अवसर पर मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.अ) को सलाम अर्पित करना भी ज़रुरी है, उन्होंने पूरे जीवन हज़रत शेख हिंद(रह.अ) के नक्शेकदम पर चलकर देश की स्वतंत्रता और निर्माण और विकास में योगदान दिया और जमीयत और कांग्रेस के मंच से जो कारनामे अंजाम दिए वह स्वर्ण अक्षरों से लिखने के काबिल है। 1920 / में जमीअत उलेमा हिंद के अधिवेशन में यह तय किया गया कि ब्रिटिश सरकार के साथ सभी तरह के संबंध और मामले हराम हैं। इसके लिए आवश्यक है कि (1) सरकारी पद छोड़ दिया जाएं (2) काउंसिल के सदस्यता छोड़ दी जाए (3) दुश्मन अंग्रेज को वाणिज्यिक लाभ न पहुंचाया जाए (4) स्कूलों और कॉलेजों में सरकारी सहायता स्वीकार न की जाए (5) दुश्मनों की सेना में भर्ती को हराम माना जाए (6) सरकारी अदालतों में मामलों न ले जाया जाएं। 1921 / जुलाई में कराची में खिलाफत आंदोलन की बैठक में भी हज़रत मदनी(रह.अ)

ने उक्त सुझावों की घोषणा किया, जिस का समर्थन मौलाना मोहम्मद अली जौहर(रह.अ);

, डॉ सैफुद्दीन कचलो आदि ने। जो नतीजे में हज़रत मदनी(रह.अ) आदि को गिरफ्तार कर लिया गया।

🟣26 / सितंबर 1921 / को कराची अदालत में हज़रत मदनी (रह.अ)ने पूरी बेबाकी और बहादुरी के साथ लंबे बयान दिया, और उक्त मामलों को दोहराया और *कहा कि ब्रिटिश सरकार की सेना में भर्ती हराम है अगर सरकार हमारी धार्मिक स्वतंत्रता छीनने के लिए तैयार है तो मुसलमान अपनी जान तक कुर्बान कर देने को तैयार होंगे। और में पहले व्यक्ति होऊंगा जो अपनी जान कुर्बान करूँगा*।

🟡इस बयान के बाद मौलाना मोहम्मद अली जौहर(रह.अ)

ने हज़रत उल मौलाना हुसैन अहमद मदनी(रह.अ)

के कदम चूम लिए। (चिराग ए मोहम्मद स. 115)

🟢जमीयत के मंच से और जिन अकाबिर उलमा ने स्वतंत्रता और फिर देश के निर्माण और विकास में रौशन खिदमतें अंजाम दिया इनमें

मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली(रह.अ)

,मौलाना अबुल कलाम आज़ाद , (रह.अ)

मुफ्ती किफायत अल्लाह दहलवी (रह.अ)

मौलाना सज्जाद बिहारी(रह.अ)

मौलाना सैयद सुलेमान नदवी , (रह.अ)

अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी (रह.अ)

मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी, (रह.अ)

शाह मुईनुद्दीन अजमीरी (रह.अ)

, मौलाना अब्दुल हक़ मदनी (रह.अ)

मौलाना सैयद मोहम्मद मियां देवबंदी(रह.अ)

मौलाना हिफ्जूर रहमान सियोहारवी(रह.अ)

मौलाना फ़ख़रुद्दीन अहमद मुरादाबाद(रह.अ)

मौलाना अहमद सईद देहलवी , (रह.अ) आदि के नाम शामिल हैं।

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इस बज़्म जूनुं के दीवाने हर राह से पहुंचे यजदां तक

है आम हमारे अफसाने दीवार चमन से ज़नदां तक

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देश की आजादी के बारे में बलिदान करने वाले इस्लामिया मदरसों के अकाबिर उलेमा के सेवाओं की एक झलक पेश की गई। हकीकत यह है कि उलेमा जिहाद ए स्वतंत्रता के चमन को अपने रक्त से सींचा और परवान चढ़ाया है।

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जब पड़ा वक्त, गुलिस्ताँ खून हमने दिया

बहार आई तो कहते हैं तेरा काम नहीं

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काम क्यों होता, सत्ता के अधिकारियों और कुछ नेताओं को तो उनका नाम तक लेना गवारा नहीं,

📕लेकिन यह खुद हमारी जिम्मेदारी है कि अपने देश और राष्ट्र के हीरो, उन मुजाहिदीन किराम को खिराज ए अकीदत पेश करें और अपने इतिहास और उपलब्धियों से अभिविन्यास प्राप्त करें और उनके नक्शे कदम को जीवन का मार्गदर्शक बनाए

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Source heritage times

संकलन *अताउल्ला पठाण सर*

*टूनकी तालुका संग्रामपूर*

*बुलढाणा महाराष्ट्र*

9423338726

Updated : 15 Aug 2022 6:58 AM GMT
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