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आजादी_का_अमृत_महोत्सव ! जंग ए आजादी मे अजीम खिदमात देने वाले हाजी इमदादुल्लाह मूहाजीर मक्की रहमतूल्लाह अलयही

Independence_Ka_Amrit_Festival! Haji Imdadullah Muhajir Makki Rahmatullah Alaihi, who gave great efforts in the war of freedom

आजादी_का_अमृत_महोत्सव ! जंग ए आजादी मे अजीम खिदमात देने वाले हाजी इमदादुल्लाह मूहाजीर मक्की रहमतूल्लाह अलयही
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भारत देश को फ़िरंगियों की गुलामी से छुटकारा दिलाने के लिए शाह वलिय्युल्लाह साहिब (र.अ.)द्वारा जो संगठन बनाया गया था, उसका झंडा एक आलिमे दीन की मृत्यु के बाद दूसरा आलिमे-दीन अपने हाथ में लेता था। शाह मुहम्मद इसहाक़ (र.अ.)आज़ादी के लिए जीवन भर संघर्ष करते हुए जब इस दुनिया से चल बसे, तो देश के ही अन्य सपूत हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)को उस तहरीक की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)ने जिला सहारनपुर के क़स्बा नानोता में जनवरी सन् 1818 में जन्म लिया था। बाज तजकीरा निगारो के मुताबिक यह तारीख 18 एप्रिल 1818 है।

उनके वालिद का नाम मौलाना मुहम्मद अमीन उमरी (रह) था। उनका खानदानी सिलसिला हज़रत उमर फारूक (रजि) से मिलता है। उनके माता पिता ने पहले उनका नाम इमदाद हुसैन रखा था। वे जब हज के लिए गए तो मौलाना इसहाक़ (र.अ.)ने उनका नाम इमदादुल्लाह रख दिया। फिरंगियों के ख़िलाफ़ जंग लड़ने के लिए शाह वलिय्युल्लाह (र.अ.)द्वारा बनाई गई जमाअत के हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)चौथे इमाम बनाये गये। वह आरंभ से ही क्रांतिकारी भावनाओं के थे। सच्चाई तो यह है कि ब्रिटिश शासन द्वारा हिन्दुस्तान पर कब्ज़ा जमा लेने के बाद भारतवासियों में उनके विरुद्ध नफ़रत का माहौल बन गया था। देशवासी सामूहिक और पृथक रूप से भी आज़ादी हासिल करने के लिए सोच विचार करते, योजनाएं बनाते और उन्हें कार्यान्वित करते रहते थे। हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)भी देश के उन्ही सपूतों में से एक धार्मिक प्रवृत्ति (मज़हबी सोच) के इन्किलाबी सपूत थे। उनकी आरंभिक तालीम उनके वतन नानोता में हई, आगे की पढ़ाई के लिए वह दिल्ली गए। वहां हज़रत शैख मुहम्मद कलन्दर (र.अ.)

और शैख़ इलाही बख़्श देहलवी (र.अ.)की शागिर्दी हासिल की। उसके बाद हाजी साहिब (र.अ.)ने सय्यिद नसरूद्दीन देहलवी (र.अ.)के मदरसे में तालीम पाई।

उन्हें जहां मज़हबी तालीम दी गई, वहीं अपने वतन से मुहब्बत, वफादारी तथा देशवासियों से अच्छे रख-रखाव व बर्ताव की शिक्षा भी दी गई। ऐसी तालीम के कारण ही उनके अन्दर अपने देश पर कुर्बान होने का जज्बा भरा था। उस समय के अधिकांश उलमा-ए-दीन हिन्दुस्तान को फिरंगियों के पंजों से छुटकारा दिलाने की योजनाएं बनाते और उनके तहत संघर्ष किया करते थे। इसी सिलसिले में शाह इसहाक़ (र.अ.)भी अपने देश में संघर्ष करते हुए तुर्की से मदद हासिल करने की ग़र्ज़ से मक्का शरीफ़ पहुंचे। उधर जब हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)को यह ख़बर मिली कि मौलाना सय्यिद अहमद शहीद (र.अ.)बालाकोट में लड़ते हुए शहीद हो गए तो वह तुरन्त

आ गए। उस समय तक शाह इसहाक़ साहिब (र.अ.)मक्का शरीफ़ पहुंच गए थे। हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)भी मक्का रवाना हो गए। वहां पहुंच कर उन्होंने शाह इसहाक़ साहिब (र.अ.)से मुलाक़ात की। उलमा की बड़ी संख्या हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)के साथ वतन की आज़ादी के लिए जमा हो गई।

हाजी साहिब (र.अ.)ने शाह इसहाक (र.अ.)के साथ एक वर्ष तक मक्का में रह कर देश को आज़ाद कराने के आन्दोलन के संचालन के बारे में प्रशिक्षण पाया। उसके बाद वह शाह इसहाक़ (र.अ.)के निर्देश पर 1846 में हिन्दुस्तान वापस लौट आए। यहां आकर वह देश की आज़ादी के मिशन में लग गए।

अंग्रेज़ों को अपने मुल्क हिन्दुस्तान से भगाने के लिए उलमा-ए-दीन मज़हबी फ़रीज़ा समझ कर संघर्ष के लिए तैयार रहा करते थे। इसी बीच सन् 1857 में फ़िरंगियों की तानाशाही के ख़िलाफ़ देशवासियों की सहन शक्ति का बांध टूट गया। आज़ादी की प्रथम लड़ाई की आग देश भर में सुलग उठी। आज़ादी के मतवाले मंगल पांडे की कुर्बानी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध पूरे देश में नफ़रत की हवाओं को तेज़ कर दिया।

🟪 उधर दिल्ली की जामा मस्जिद में उलमा-ए-दीन द्वारा मौलाना फ़ज़ले-हक़ खैराबादी (र.अ.)के जिहाद के फ़तवे पर सामूहिक दस्तख़तों ने भुस में चिंगारी का काम किया। फिर क्या था, मुसलमान, अंग्रेज़ों को हिन्दुस्तान से उखाड़ फेंकने के लिए सरों से कफ़न बांध कर कूद पड़े। उसके लिए हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)को अमीरे-जिहाद नियुक्त किया गया। मौलाना क़ासिम नानोतवी (र.अ.)को सेनापति (सिपहसालार), मौलाना रशीद अहमद गंगोही (र.अ.)को क़ाज़ी बनाया गया। मौलाना मुनीर नानोतवी (र.अ.)और हाफ़िज़ ज़ामिन थानवी (र.अ.)को अफ़सर नियुक्त किया गया।

अमीरे जिहाद हाजी इमददुल्लाह रह0 ने मौलाना रशीद अहमद गंगोही रह0 को चालीस मुजाहिदीन (क्रांतिकारी) के एक दस्ते का सालार मुकर्रर फ़रमा कर हुक्म दिया कि वह शहर के हाशिये से गुज़रने वाली शाहराह से मुत्तसिल शेर अली के घने बाग़ में छुप जाएं, जब अंग्रेज़ों का तोपखाना वहां से गुज़रे तो उस पर कमींगाह से गोलियां बरसाएं, यह जंगी हिक्मते अमली कारगर साबित हुई। अंधेरे में मुजाहिदीन की अचानक फ़ायरिंग से अंग्रेज़ सिपाही बोखला गए, उन्हें यह ख़ौफ़ हुआ कि घने बाग़ की आड़ में बहुत बड़ी फ़ौज मौजूद होगी, इसलिये वे जानें बचाकर भाग निकले और तोपख़ाना मुजाहिदीन (क्रांतिकारी) के हाथ आगया।

वर्तमान यूपी के जिला मुज़फ़्फ़रनगर के क़स्बा थाना भवन में हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)के नेतृत्व में उलमा जमा हो गए। जिहाद का एलान सुनते ही हज़ारों की संख्या में वहां अन्य मुजाहिदीन भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जिहाद करने के लिए कूद पड़े। यहां तक कि थाना भवन और उस के आस पास के क्षेत्रों से अंग्रेज़ों को मार भगाया गया। मुजाहिदों द्वारा उस क्षेत्र को अंग्रेज़ों से बेदखल करा लिया गया। उलमा के उस लश्कर ने वहां अपनी आज़ाद हुकूमत कायम करने का एलान कर दिया। फ़िरंगी इससे बौखला उठे। हालांकि वह आज़ाद हुकूमत ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। शामली के मैदान में हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)की मातहती में अंग्रेज़ों से

डट कर मुक़ाबला हुआ। उसमें कई मुजाहिदीन भी देश की आज़ादी के लिए लड़ते हुए शहीद हुए।

लेखक एवं स्वतन्त्रता सेनानी श्री मेवाराम गुप्त सितोरिया ने अपनी पुस्तक"हिन्दुस्तान की जंगे आज़ादी के मुस्लिम मुजाहिदीन"" में उल्लेख किया है कि अंग्रेज़ अपनी पुरानी नीति के अनुसार हिन्दुओं और मुसलमानों में फूट डालो और के राज करो की राजनीति कर रहे थे। उस समय बहादुरशाह ज़फ़र को नाम मात्र का बादशाह बना रखा था, पकड़ फ़िरंगी हाथों में ही थी। ऐसे समय में हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)

ने देशवासियों के बीच एकता के प्रयास किए। उन्होंने न केवल खुद हिम्मत से काम लिया, बल्कि देशवासियों की भी हिम्मत बंधाई। अपनी पार्टी को अंग्रेज़ों के मुक़ाबले के लिए मज़बूत किया। गुलामी की अन्धेरियों में मुजाहिदीन को आज़ादी की रोशनी की चमक दिखाई।

हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)इन्किलाबी होने के साथ ही एक बड़े सूफ़ी भी थे। वह एक सच्चे वतन प्रेमी थे इसलिए उनकी जुबान से निकले हुए बोल लोगों को बहुत प्रभावित करने वाले हुआ करते थे। यही कारण था कि 1857 में आज़ादी की पहली लड़ाई शुरू होते ही हज़ारों की संख्या में मुस्लिम मुजाहिदीन उनके नेतृत्व में देश पर अपनी जानें कुर्बान करने के लिए जमा हो गए थे। सूफ़ी बुज़ुर्गों को न तो जीने की ज़्यादा तमन्ना होती है और न ही वे मरने से डरते हैं, हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)ने शामली की जंग में फ़िरंगियों की हिम्मतों को तोड़ दिया और उनके हौसलों को पस्त कर दिया था। उनके क़रीबी साथियों में मौलाना अब्दुल ग़नी (र.अ.), मौलाना मुहम्मद याकूब,(र.अ.) मौलाना मुहम्मद क़ासिम (र.अ.)और मौलाना रशीद अहमद (र.अ.)थे। वे सभी हर मौके पर उनके साथ रहा करते थे।

1857 के स्वतन्त्रता संघर्ष में अंग्रेज़ों को देश भर में बहुत नुक़सान उठाना पड़ा। इसी कारण लड़ाई की नाकामी के बाद फ़िरंगियों ने देशवासियों पर जुल्म व सितम ढाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुसलमानों की गिनती फ़िरंगियों के ख़ास दश्मनों में होती थी। विशेष कर उलमा-ए-दीन को वे अपना बड़ा दुश्मन मानते थे। अंग्रेज़ों ने केवल बग़ावत के शक में ही हज़ारों शहरियों को मौत का मज़ा चखा दिया। उलमा पर तो अंग्रेज़ों के ज़ुल्म और दरिन्दगी का अन्दाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि *1857 की जंगे आज़ादी की प्रथम लड़ाई में लगभग बाईस हज़ार उलमा को शहीद किया गया था।*

1857 के स्वतन्त्रता संघर्ष के बाद फ़िरंगियों के ज़ुल्म और ज़्यादतियों से बचने के लिए हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)भी लम्बे समय तक गांव-खेड़ों में अपना समय गुज़ारते रहे। हालांकि पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए पीछा करती रही, परन्तु पकड़ने में नाकाम रही। वह पुलिस की पकड़ से बचते, तकलीफ़ें उठाते हुए मक्का शरीफ़ पहुंच गए। वहां पहुंच कर भी वह हिन्दुस्तान के मुजाहिदीन का नेतृत्व करते रहे। यहां तक कि 18 ऑक्टोबर या 19 ऑक्टोबर 1899 में मक्के में ही उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का आख़िरी सफ़र पूरा किया। आपको जन्नतुल

मुअल्ला इस मुबारक कब्रस्तान मे जगह मिली

हाजी इमदादुल्लाह (र.अ.)जब तक ज़िन्दा रहे अपने देश को आज़ाद कराने के लिए ईमानदारी से संघर्ष करते रहे। एक सूफ़ी आलिम-ए-दीन का अपने वतन की आज़ादी के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहना उनके वतन प्रेमी और स्वतंत्रता सेनानी होने की अलग ही पहचान है।

वाजेह हो की ये हजरत हाजी साहेब रहमतूल्लाह अलयही का महज इजमाली परिचय है।आप के रुहाणी कमालात और मूलक और मील्लत के लिये अजीम कारनामो की एक मबसुत तारीख है जीसमे तमाम बा शऊर मुसलमनो को वकिफ व आगाह होना वक्त की अहम जरूरत है

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संदर्भ -1)तहरीके-आजादी में उलमाए किराम का हिस्सा, पटना,2013. पृष्ठ 91,94

लेखक-मौलाना अबुल कलाम कासिम शम्मी

2)फखरे वतन ,पृष्ठ 199 ,200,201,204

लेखक-फारूक अरगली

3)हिन्दुस्तान की जंगे आजादी के मुसलमान मुजाहिदीन, किताबदार, मुम्बई,

1988 एव 2012 पृष्ठ 21

लेखक - मेवाराम गुप्त सितोरिया

4)जंग ए आजादी और मुसलमान

लेखक -खालिद मोहम्मद खान

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संकलन -अताउल्ला खा रफिक खा पठाण सर

टूनकी तालुका संग्रामपुर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र

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Updated : 7 Aug 2022 3:35 PM GMT
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