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स्वतंत्रता सेनानी➡️2️⃣6️⃣7️⃣ शेर ए मैसूर टिपू सुलतान (र.अ.) के परिवार की बहादूर बेटी स्वतंत्रता सेनानी नूरून्निसा इनायत ख़ान

Freedom Fighter➡️2️⃣6️⃣7️⃣ Freedom fighter Nurunnisa Inayat Khan, the brave daughter of the family of Sher A. Mysore Tipu Sultan (RA)

स्वतंत्रता सेनानी➡️2️⃣6️⃣7️⃣  शेर ए मैसूर टिपू सुलतान (र.अ.) के परिवार की बहादूर बेटी स्वतंत्रता सेनानी नूरून्निसा इनायत ख़ान
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जाकीर हुसैन - 9421302699


नूरून्निसा इनायत ख़ान शेरे-मैसूर टीपू सुलतान के परिवार की एक बहादुर बेटी थीं।

1857 के क़त्ले-आम में टीपू सुलतान की एक पौत्री को दो वफ़ादारों ने क़त्ल होने से बचा लिया था। टीपू सुलतान की उस पौत्री की एक बेटी थीं ख़दीजा बीबी। ख़दीजा बीबी के ज्येष्ठ पुत्र का नाम था इनायत ख़ान । इनायत खान जब फ्रांस में थे तब उनकी भेंट 'ओरारे बेकर' नामी लड़की से हुई। उन्होंने उससे विवाह कर लिया।

नूरून्निसा का जन्म इनायत ख़ान और ओरारे बेकर के यहां मास्को में 1914 में हुआ। उन्होंने फ्रांस में शिक्षा ग्रहण की। उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी भाषाओं की वह ज्ञाता थीं। उन्होंने इतिहास का भी सखोल अध्ययन किया था।

1926 में यह परिवार भारत वापस आ गया, जहां कुछ ही समय पश्चात् इनायत ख़ान का निधन हो गया। नूरून्निसा की माताजी विदेशी होने के बावजूद पर्दे में रहती थीं। भाई छोटा था इसलिये नूरून्निसा पर परिवार का दायित्व आ गया। दूसरा विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। जल सेना, थल सेना और वायु सेना में भर्ती आरंभ हुई तो नूरून्निसा ने भी वायु सेना में प्रवेश के लिये प्रार्थना पत्र भेज दिया। उन्हें साक्षात्कार के लिये बुलाया गया।

जब नूरून्निसा इंटरव्यू बोर्ड के सामने गईं तो अधिकारियों ने महसूस किया कि नूरून्निसा में वह सभी गुण विद्यमान हैं जो एक अच्छे जासूस में होना चाहियें। वे न केवल अद्वितीय सौंदर्य की स्वामिनी थीं अपितु प्रखर बुद्धि की मालिक भी थीं। उनका चयन हो गया।

सर्वप्रथम नूरून्निसा को रेडियो-ऑपरेटर का प्रशिक्षण दिया गया, फिर कुशल जासूस बनने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण पूर्ण होने के पश्चात् एक रात उन्हें पैराशूट के द्वारा पैरिस में उतार दिया गया। पैरिस में वह सूटकेस में ट्रांसमीटर लेकर संदेश भेजने का कार्य करने लगीं।

ट्रांसमीटर देखने में सिनेमा की मशीन की तरह दिखाई देता था। विश्वयुद्ध के दौरान 'गेस्टापो' अत्यंत तत्परता से काम कर रही थी। जर्मन सिपाही अपनी मोटरों में ऐसी मशीनें लगाकर घूमते थे जिनसे गुप्त संदेश भेजने वालों का पता चल सके। नूरून्निसा इसी लिये लोकल ट्रेनों से आसपास के गांवों में जाकर सूचनाएं भेजती थीं। गेस्टापो वाले कभी उन्हें रोक लेते तो वह सूटकेस खोल कर दिखा देतीं और कहतीं कि बच्चों का सिनेमा दिखाने की मशीन है।

नूरून्निसा अपना काम कुशलतापूर्वक कर रहीं थीं कि एक घटना घट गई। उनका एक साथी जासूस पकड़ा गया। उस पर अमानवीय अत्याचार किये गए । विवश हो कर उसने अपने साथियों के नाम बता दिये। कई जासूस गिरफ्तार हो गए। नूरून्निसा गेस्टापो के हाथ पड़ने से बच गईं। जासूसों की गिरफ्तारी की सूचना जब लंदन पहुंची और यह भी मालूम हुआ कि कुछ जासूस गिरफ़्तारी से बच गए हैं तो उन्हें लाने के लिये एक विमान भेजा गया। नूरून्निसा ने लौटने से इनकार कर दिया। कहा, "मैं भारत में अंग्रेज़ी शासकों के प्रति वफ़ादारी जताने अथवा उन्हें खुश करने के लिये नहीं अपितु अपने देश को स्वतंत्र कराने के लिये लड़ रही हूं। मैं काम अधूरा छोड़ कर वापस नहीं आऊंगी।"

नूरून्निसा की तलाश गेस्टापो वाले बहुत ज़ोर-शोर से कर रहे थे वह मेडेलिन नाम से एक महिला के साथ रह रही थीं। एक दिन उस महिला को मालूम हो गया कि वह नूरून्निसा हैं। इनाम की लालच में उसने नूरून्निसा को गिरफ्तार करा दिया। एक बार पहले भी वह गिरफ़्तार हुई थीं। उस समय उन्होंने स्नानागार की खिड़की तोड़ कर फ़रार होने का प्रयत्न किया था और असफल हो गई थीं, पर उनका निश्चय शिथिल नहीं हुआ था। स्वयं तो फ़रार होने की योजनाएं बनाती रहतीं और साथियों को आश्वासन देती रहतीं कि, "हिम्मत रखो, जीत हमारी ही होगी।"

इस बार भी जब नूरून्निसा को क़ैद किया गया तो खाना लाने वाली महिला को घूस देकर उन्होंने लोहा काटने वाली आरी प्राप्त की फिर अपने दो साथियों के साथ रौशनदान की सलाखें काट डालीं । रौशनदान से निकल कर वे तीनों इमारत की छत पर पहुंचे पर दुर्भाग्य से पकड़े गए ।

फ़रार होने के प्रयत्न में फिर नूरून्निसा पर मुकदमा चला और 1944 में उन्हें बदनाम 'उशाऊ कैम्प' में भेज दिया गया। वहां उन्हें अमानवीय यातनाएं देकर क्षमा मांगने और साथियों के नाम बताने पर विवश किया गया पर नूरून्निसा ने न क्षमा मांगी न साथियों की जानकारी दी।

अंततः जासूसी के आरोप में नूरून्निसा को मृत्युदंड दिया गया।उन्हें गोली मार दी गई ।

नूरून्निसा ने देश के लिये अपने प्राणों की बलि दे दी। 1945 में दूसरा महायुद्ध समाप्त हुआ। 16 जनवरी 1946 को फ्रांस के जनरल डेगाल ने नूरून्निसा को मरणोपरांत शौर्य-पदक से सम्मानित किया। 15 अप्रेल 1949 को भारत में भी नूरून्निसा की देश-सेवाओं के लिये उन्हें गौरव प्रदान किया गया।

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संदर्भ -भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाएं

पृष्ठ 58

लेखिका -डॉ० बानो सरताज

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संकलन तथा अनुवादक *अताउल्ला पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र*

9423338726

Updated : 22 Aug 2021 1:37 PM GMT
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