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भारत देश आजादी के लिये सब कुछ कुर्बान करणे वाले स्वतंत्रता सेनानी मोहम्मद उमर सुभानी

Freedom fighter Mohammad Omar Subhani who sacrificed everything for the independence of India

भारत देश आजादी के लिये सब कुछ कुर्बान करणे वाले स्वतंत्रता सेनानी मोहम्मद उमर सुभानी
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6 जुलै -यौमे वफात(पुण्यतिथी)

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जाकीर हुसैन - 9421302699


आपने तिलक स्वराज फण्ड के लिए गांधीजी को ब्लैंक चेक दिया था-

आपने अपने बंगले सुभानी विला को ख़िलाफ़त व नान काआपरेटिव मूवमेंट के दफ्तर के लिए दान कर दिया

साथ ही 1,00,000 रुपये बम्बई कांग्रेस कमेटी के खर्च के लिए नगद दिये।

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मोहम्मद उमर सुभानी साहब की पैदाइश सन् 1890 में बाम्बे में हुई थी। आपके वालिद का नाम मोहम्मद युसुफ़ सुभानी था।

आपके वालिद साहब की कपड़ों की कई मिलें थीं।

उस ज़माने में आपके वालिद साहब को कॉटन किंग के नाम से जाना जाता था। उमर सुभानी साहब अपने कारोबार की परवाह किये बिना इण्डियन नेशनल कांग्रेस के मेम्बर बने और जंगे-आज़ादी की जद्दोजहद में लग गये। कुछ ही दिनों में आप आंदोलनो के जुलूसों और मीटिंगों को आर्गेनाइज़ करने में माहिर हो गये। जिस पर गांधीजी ने एक मीटिंग में आपको स्टेज मैनेजर कहकर सम्मानित किया। आपने होमरूल मूवमेंट में एनी बेसेन्ट के साथ बहुत मेहनत व हिम्मत से प्रोग्रामों को कामयाब कराया। उसके बाद आप कांग्रेस के हर छोटे-बड़े प्रोग्राम और आंदोलन में एक मज़बूत नेता बनकर सामने आये।

आपने ख़िलाफ़त और नान कापरेटिव मूवमेंट में भी सन् 1921 में हिस्सा लिया और जेल गये।

विदेशी सामानों और कपड़ों के बहिष्कार आंदोलन में आपने अपनी कम्पनी के जितने भी कपड़े विदेशो से आये थे, उसे खुद आग लगा दी जिसमें करोड़ों रुपयों का नुकसान हुआ, जिसे आपने हंसते-हंसते सह लिया।

आंदोलन के लिए जब भी फण्ड की कमी हुई और फण्ड इकट्ठा करने की मुहिम चली तो आप हमेशा आगे रहे। सबसे पहले आपने तिलक स्वराज फण्ड के लिए गांधीजी को ब्लैंक चेक दिया

यही नहीं, आपने अपने बंगले सुभानी विला को ख़िलाफ़त व नान काआपरेटिव मूवमेंट के दफ्तर के लिए दान कर दिया

और साथ ही 1,00,000 रुपये बम्बई कांग्रेस कमेटी के खर्च के लिए नगद दिये।

आपकी इन कार्यवाहियों की वजह से मिल का काम आहिस्ता-आहिस्ता ख़राब होने लगा। दूसरी तरफ अंग्रेज़ नौरकशाहों ने मिल का कॉटन मुल्क के बाहर भेजने पर रोक भी लगा दी।

अंग्रेज़ों की तरफ़ से मिल चलाने के लिए आपको जंगे-आज़ादी के आंदोलनों से अलग होने और मदद न करने की शर्त रखी गयी, जिसे आपने ठुकरा दिया।

अब आपके सामने खुद पैसों की दिक़्क़तें सामने आ गयी मील के काम बन्द होने से फौरी तौर पर आपको तीन करोड़ चालीस लाख रुपयों का नुक़सान हुआ। इसके बाद आप खुद मेंटली डिप्रेशन में चल गये।

आपने अपनी सारी पूंजी इण्डियन इण्डिपेंस मूवमेंट में लगा दिया और ख़ुद बीमारी की हालत में मोहताजी की ज़िन्दगी गुज़ारने लगे।

एक दिन अचानक 6 जुलाई सन् 1926 को लोगों ने आपको मरा हुआ पाया।

मुल्क की आज़ादी के लिए मादरे-वतन का यह जांबाज़ सिपाही हालात की बेबसी में शहीद हो गया।

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इनकी कुर्बानियो को जमाना भूल गया ,लेकीन हम ने भी कहा इनकी यादो को जिंदा रखा?

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आईये इनके कुर्बानियो को सलाम करते है

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संदर्भ :1)THE Immortals

लेखक syed naseer ahmed

+91 94402 41727

2) लहू बोलता भी है

लेखक- सय्यद शहनवाज अहमद कादरी,कृष्ण कल्की

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संकलन तथा अनुवादक लेखक- अताउल्ला खा रफिक खा पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपुर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र

9423338726

Updated : 6 July 2021 3:29 AM GMT
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