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एक सच्चे देश प्रेमी और जंगे आज़ादी के नायक थे कर्नल महबूब अहमद।

Colonel Mehboob Ahmed was a true patriot and a hero of the freedom struggle.

एक सच्चे देश प्रेमी और जंगे आज़ादी के नायक थे कर्नल महबूब अहमद।
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आज़ाद हिन्द फौज के हीरो थे कर्नल महबूब अहमद।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के विश्वास पात्र साथी थे कर्नल महबूब अहमद।

हिन्दु-मुस्लिम एकता और आपसी सौहार्द के प्रतीक थे कर्नल महबूब अहमद।

बरेली, उत्तर प्रदेश।

दरगाह आलाहज़रत बरेली का आलाहज़रत द्वारा स्थापित कर्दा मदरसा मंज़रे इस्लाम अपनी ई-पाठशाला द्वारा गूगल मीट/जूम ऐप और अपनी अधिकृत वेबसाइट के माध्यम से आॅनलाइन युवाओं, छात्रों खासकर मुस्लिम समुदाय को आपसी सौहार्द तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के अलंबरदार मुस्लिम क्रान्तकारियों और जंगे आज़ादी में अग्रणी भूमिका निभाने वाले वीरों से संबन्धित ऐतिहासिक ज्ञान प्रदान कर रहा है।

दरगाह के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी ने बताया कि 9 जून 1992 ई0 में आज़ाद हिन्द फौज के नायक और अंग्रेज़ी साम्राज्य से टक्कर लेने वाले एक महान योद्धा कर्नल महबूब अहमद का देहांत हुआ था इसलिए मंज़रे इस्लाम की ई-पाठशला द्वारा कर्नल महबूब अहमद की याद में मंज़रे इस्लाम के वरिष्ठ शिक्षक और प्रतिष्ठित बुद्धजीवी मुफ्ती मो0 सलीम बरेलवी साहब ने बरेली मण्डल के उपनिदेशक अल्पसंख्यक कल्याण विभाग जनाब जगमोहन सिंह जी के तत्वाधान में एक विशेष आनलाईन कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें तहरीके आज़ादी और भारत को ब्रिटिश राज्य से मुक्ति दिलाने में अहम भमिका निभाने वाले इंण्यिन नेशनल आर्मी के हीरो कर्नल महबूब अहमद के कारनामों पर प्रकाश डालते हुए मुफ्ती सलीम नूरी ने युवाओं को बताया कि कर्नल महबूब अहमद का जन्म 1920 ई0 को पठना के चैहट्टा नामी एक छोटे से गांव में जीवन व्यवतीत करने वाले एक गरीब परिवार में हुआ। यह वह दौर था कि जब हिन्दुस्तान अंग्रेजों का गुलाम था और ब्रिटिश साम्राज्य से हिन्दुस्तान को आज़ाद कराने का संग्राम और तहरीक अपनी चरम सीमा पर थी । भारत को आजाद कराने का जज़्बा लेकर कर्नल महबूब अहमद परवान चढ़ रहे थे जबकि उनके पिता मामूली डाक्टर थे। इसी आजादी के जज्बे और आजादी के सपनों को अपनी आंखों में सजाए केवल 11 वर्ष की आयु ही में देहरादून पढ़ाई करने चले गये। एक ही वर्ष में अपने स्कूल की फुटवाल टीम के कैप्टन बने। चूंकि कर्नल महबूब देश को आजाद कराने के लिए एक फौजी योद्धा व सिपाही बनने का दृढ़ संकल्प रखते थे इसलिए आॅल इंण्डिया संयुक्त सेना परीक्षा में उन्होंने सफलता प्राप्त की और ब्रिटिश इंण्डियन सेना में सेंकेण्ड लेफ्टीनेन्ट पद पर ब्राजमान हो गये।

द्वितीय विश्व युद्ध के मोके पर जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 1943 में आजाद हिन्द फौज की कमान संभाली और इसका विस्तार किया तो सच्चे देश प्रेममियों और देश के लिए बलिदान देने वाले योद्धाओं को इसमें भर्ती करना शुरू किया। एक मौके पर कर्नल महबूब अहमद ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का देश प्रेम में डूबा भाषण सुना तो उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी छोड़कर आज़ाद हिन्द फौज में सम्मिलित होकर अपने आप को अपने वतन हिन्दुस्तान पर कुर्बान करने के लिए समर्पित कर दिया। वर्मा सीमा पर कर्नल महबूब की पहली मुठभेड़ ब्रिटिश सेना से हुई और ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ाते हुए उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज को एक ऐतिहासिक जीत दिलाई। 1944 ई0 में इंफाल के समीप एक लंबी लड़ाई के बाद आज़ाद हिन्द के योद्धाओं कर्नल शौकत मलिक, लाल सिंह, राम प्रसाद, मोहम्मद खान, मेजर आबिद हसन के साथ मिलकर उन्होंने इंफाल की सरज़मीन पर आजाद हिन्द फौज का झण्डा लहरा दिया।

आजाद हिन्द फौज में हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी धर्मों के सिपाही थे जो एक दूसरे के ऊपर अपनी जान छिड़कते थे। आजाद हिन्द फौज हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रतीक और आपसी सौहार्द का एक उम्दा नमूना और उदाहरण थी। कर्नल महबूब अहमद एक सच्चे देश प्रेमी थे जिनका देहान्त 9 जून 1992 को पटना की सरजीमन पर हुआ।

मंज़रे इस्लाम के वरिष्ठ शिक्षक मास्टर कमाल अहमद साहब ने कहा कि नफरत के सौदागरों को और देश को तोड़ने वाले फिरका परस्तों को ऐसे देश प्रेममियों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

मंज़रे इस्लाम के आई0टी0 सेल प्रमुख जुबैर रज़ा खान साहब ने बताया कि हम यह प्रयास कर रहे हैं कि कर्नल महबूब जैसे देश प्रेमियों के इतिहास से अपने युवाओं को अवगत कराकर उनके अंदर देश के प्रति बलिदान का जज्बा पैदा करें और नफरत फैलाकर इस देश को फिरका परस्ती की आग में झोकने वालों के नापाक इरादों का खात्मा करें। इसके लिए हम अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया फेसबुक ,वहाटस अप ग्रुप्स आदि के माध्यम से कक्रान्तिकारियों व देश प्रेमियों के देश की उन्नति में दिये गये योगदान का प्रसारण करें।

Updated : 9 Jun 2021 4:53 PM GMT
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