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ब्रिगेडियर उस्मान के आखिरी शब्द थे "मैं मर रहा हूँ लेकिन हमारा इलाका हमारा है ,हम दुश्मन के गिर जाने तक लड़ेंगे

Brigadier Usman's last words were "I am dying but our territory is ours, we will fight till the enemy falls

ब्रिगेडियर उस्मान के आखिरी शब्द थे मैं मर रहा हूँ लेकिन हमारा इलाका हमारा है ,हम दुश्मन के गिर जाने तक लड़ेंगे
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3 जुलै - शहीदत_को_सलाम-नौशेरा_का_शेर :ब्रिगेडियर_मुहम्मद_उस्मान


जाकीर हुसैन - 9421302699


देश आज़ाद हुआ ही था और आखें खोले तिरंगे में लिपटी सुनहरी सुबह को निहार ही रहा था कि ब्रिग्रेडियर उस्मान को आजादी के कुछ दिनों के अंदर ही कश्मीर के झांगर में तैनात 50 पैराशूट ब्रिगेड को कमांड करने के लिए भेजा गया।

जमीलन बीबी और फारुख का बेटा उस्मान जब बनारस के हरिश्चद्र इंटर कालेज में पढने जाता था तो मोहल्ले की खुबसूरत लड़कियां अपने झज्जे पर खड़ी हो जाती थीं।

मगर क्या मजाल कि उस्मान अपनी आँखें ऊपर करे, कहते हैं जब ब्रिगेडियर उस्मान की आँखें जब ऊपर होती थी दुश्मन की आँखें हमेशा के लिए बंद हो जाती थी।

खुबसूरत आँखें मासूम चेहरा और लोहे के जैसा कलेजा । उस्मान के लिए देश ही सब कुछ था , उसका परिवार ,उसका घर बार,उसकी दुनिया।

यह एक बात उन्होंने बार बार साबित की , लेकिन इन्तेहाँ तब हुई जब मऊ के बीबीपुर गाँव में जन्में उस्मान ने कश्मीर को पाने के लिए और हिंदुस्तान के लिए एक दिन अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

भारत पाकिस्तान के विभाजन के समय जब पूरे देश में दंगे भड़के हुए थे सेना का भी विभाजन हो रहा था तब 10 वीं बलूच रेजिमेंट के अधिकारी उस्मान ने हिन्दुस्तान में ही रहने का फैसला किया। जबकि उसके सभी मुस्लिम साथी पाकिस्तान जा रहे थे।

तब पाकिस्तानी हुक्मरानों लियाकत हुसैन और मुहम्मद अली जिन्ना ने ब्रिग्रेडियर उस्मान को मुसलमान और इस्लाम की दुहाई दी तथा ब्रिगेडियर उस्मान को आऊट आफ टर्न सेना का प्रमुख बनाने का भी आफर दिया लेकिन उन्होंने उससे इंकार कर दिया।

यह होती है देश से मुहब्बत जिसे अंग्रेजों से माफी माँग कर जेल से छूटे और आजादी के दिवानों के खिलाफ झूठी गवाही देने वालों के वंशज कभी नहीं कर पाएंगे।

खैर

भारत-पाकिस्तान के बटवारे में बलूच रेजीमेन्ट पाकिस्तान के हिस्से में गयी तो ब्रिगेडियर उस्मान डोगरा रेजिमेंट में चले गए।

नहीं भुला जाना चाहिए यह वही रेजिमेंट है जिसके बेस पर उरी में पिछले दिनों पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला किया था।

खैर ,

इसके पहले की ब्रिगेडियर उस्मान कश्मीर के झांगर में पहुँचते आश्चर्यजनक तौर से पाकिस्तानी सेना गैरिसन की तैनारी से घबरा गई और लगभग 6 हजार सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना ने झांगर पर कब्ज़ा कर लिया था।

बगल में ही नौशेरा सेक्टर था उस्मान ने नौशेरा को दुश्मन से बचाए रखने के लिए जबरदस्त व्यूह रचना रची उन्होंने सबसे पहले उत्तर दिशा में स्थित कोट पहाड़ी को पाकिस्तानियों के कब्जे से मुक्त कराया। यह वो पहाड़ी थी जिससे समूचे नौशेरा पर निगाह रखी जा सकती थी।

बिग्रेडियर उस्मान के सफल नेतृत्व में एक फरवरी 1948 को भारतीय सेना ने कोट और नौशेरा के आस पास के इलाके पर आक्रमण किया और सुबह तक समूचे नौशेरा पर अपना कब्ज़ा जमा लिया।

सबसे जबरदस्त सफलता तब मिली जब फरवरी 1948 के अंतिम सप्ताह में लेफिटनेंट जनरल के एम् करियप्पा के नेतृत्व में बनाई गई योजना का सफल क्रियान्वयन करके बिग्रेडियर उस्मान ने झांगर पर भी अपना कब्ज़ा जमा लिया।

ब्रिग्रेडियर उस्मान की वीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि समूचे कश्मीर में उन्हें "नौशेरा का शेर" कहा जाता था।

झांगर पर हिन्दुस्तानी कब्जे के बाद वो बार बार उस पर दुबारा कब्जे की योजना बनाता रहा। पाकिस्तान ने मई 1948 में अपनी नियमित सेना झांगर के पास लगा दी।

3 जुलाई 1948 को झांगर में भीषण युद्ध हुआ जिसमे एक हजार पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और लगभग उतने ही घायल हुए इधर ब्रिगेडियर उस्मान के नेतृत्व वाली 50 पैराशूट ब्रिगेड के महज 33 जवानों की मौत हुई और 102 घायल हुए उसी युद्ध के दौरान 25 पाउंड का एक शेल मेजर उस्मान के ऊपर जा गिरा और भारत माँ का यह बेटा शहीद हो गया।

ब्रिगेडियर उस्मान के आखिरी शब्द थे :- "मैं मर रहा हूँ लेकिन हमारा इलाका हमारा है ,हम दुश्मन के गिर जाने तक लड़ेंगे"।

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लेखक मोहम्मद जाहिद

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संकलन अताऊल्ला पठाण सर

टूनकी बुलढाणा महाराष्ट्र

9423338726

Updated : 3 July 2021 5:32 PM GMT
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