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7 एप्रिल-यौमे वफात 1857 रणसंग्राम की महिला क्रांतिकारी बेगम हजरत महल

7 एप्रिल-यौमे वफात 1857 रणसंग्राम की महिला क्रांतिकारी बेगम हजरत महल
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भारत की आज़ादी में कई सारे क्रांतिकारी वीर पुरुषों ने योगदान दिया और अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया.

हालांकि, इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देश की महिला क्रांतिकारियों ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाया.

इसी कड़ी में बेगम हज़रत महल का नाम भी आता है, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ लुटाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ीं

अवध की बेगम कही जाने वाली हज़रत महल ने 1820 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में अपनी आँखे खोलीं. इनके बचपन का नाम मोहम्मद खानम था. कहते हैं कि इनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था, जिससे इनको जीवन में कई बड़े उतार-चढ़ाव देखने को मिले.

उनकी शादी नवाब वाजिद अली शाह से हुयी।

कुछ महिनो बाद पिता बनने की खबर जैसे ही नवाब वाजिद अली शाह को पता चली, तो उसने उनको 'इफ्तिखार-उन-निसा' का लकब दे दिया. अगली कड़ी में, जब बेगम ने अवध के वारिस 'बिरजिस कद्र' को जन्म दिया, तो उनको 'बेगम हज़रत महल' का नाम दिया गया. आगे वो इसी नाम से मशहूर भी हुईं.

पति के बंदी बनाए जाने पर सभांली अवध की गद्दी

नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बनने तक के सफ़र में बेगम हज़रत महल की जिंदगी में कई मोड़ आए.

एक ऐसा वक़्त भी आया, जब 1856 में नवाब ने ब्रिटिश हुकूमत के अधीन सिद्धांतों को मानने से इंकार कर दिया. इस कारण अंग्रेजों ने अवध के राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता भेज कर बंदी बना लिया.

ऐसी स्थिति में बेगम ने अवध राज्य के कार्यभार को सभांलने का फैसला किया. साथ ही अपने पति के बंदी बनाए जाने पर हज़रत महल ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ चिंगारी लगाना शुरू कर दिया.

नजीता यह रहा कि 1857 की क्रांति से पहले ही अवध राज्य में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नारजगी का दौर शुरू हो चुका था.

अगली कड़ी में 1857 की स्वतंत्रता संग्राम छिड़ने पर बेगम हज़रत महल ने अपने 12 साल के बेटे बिरजिस कदर को अवध की गद्दी पर बैठा दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि वह पूरी तरह से अंग्रेजों से दो-दो हाथ करना चाहती थीं.

बेगम हज़रत महल ने अपने बेटे बादशाह ब्रिजीस क़दर के नाम से देशवासियों के लिए एक संदेश जारी किया जिसका संक्षिप्त अनुवाद इस तरह है-"सभी हिंदू

और मसलमान अपने अपने धर्म, जान व माल अकपनी इज़्ज़त व सम्मान की सरक्षा चाहते हैं। ऐसा देखने में आ रहा है कि फ़िरंगी भारतवासियों के दीन एवं धार्म के

दश्मन बन चुके हैं। वे चाहते है कि सभी भारतवासी ईसाई बन जायें। उनकी कोशिशों से बड़ी संख्या में ऐसा हो भी रहा है। अंग्रेज़ों की नज़र में किसी भी बडे

या छोटे हिन्दुस्तानी की कोई क़ीमत नहीं है। वे जब चाहते हैं और जहां चाहते हैं इज़्ज़तदार लोगों को फांसी पर लटका देते हैं, सम्मानित व्यक्तियों के घरों को लुट लेते हैं, उनके बच्चों को मार फेंकते हैं, जब उचित समझते हैं तो हमारे ज़मीदारों को लालच देने लगते हैं। ऐसे हालात में सभी देशवासियों को आगाह किया जाता है कि जिन्हें अपने दीन-धर्म, अपनी इज़्ज़त और आबरू, जान व माल की सुरक्षा

चाहिए वे झूठे और फ़रेबी अंग्रेज़ों के धोखे में न आएं। वे अवध की फ़ौज का साथ दें। हमारी सरकार की जानिब से उनकी तरक्क़ी और हिफ़ाज़त के लिए मज़बूत क़दम उठाये जायेगे

ऐसा माना जाता है कि हिदुस्तान की पहली जंगे आज़ादी में लखनऊ का नेतृत्व हज़रत महल ने ही किया था.

बेगम ने आन्दोलन के सही संचालन के लिए अच्छी सूझ-बूझ के हिन्दुओं और मुसलमानों की बराबर संख्या में एक परामर्श समिति (मुशावरती कमेटी) भी

। बना दी थी। जिस में सभी मिल जुल कर महत्वपूर्ण फ़ैसले लिया करते थे। बेगम की इस समझदारी के कारण आपसी एकता भी बनी रही और संघर्ष में भी मज़बूती

रही

'महिला सैनिक दल' था उनकी असल ताकत

अपने बेटे की ताजपोशी के बाद हज़रत महल ने 1857 की क्रांति में अपनी साहस और बहादुरी का परिचय दिया. उन्होंने अवध राज्य के नागरिकों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया.

ऐसा माना जाता है कि बेगम हज़रत महल हिन्दू मुस्लिम में भेदभाव नहीं करती थीं. उन्होंने सभी धर्मों के सैनिकों को समान अधिकार दिया था.

कहा जाता है कि बेगम हज़रत महल में गजब का कुशल नेतृत्व था, जिसके कारण अवध के जमींदार, किसान और सैनिक सभी उनके अधीन हो गए. इसके साथ ही इनको इस स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहिब का भी बहुत साथ मिला, जोकि रानी लक्ष्मीबाई के दोस्तों में से एक थे.

यही नहीं, कहा तो यह भी जाता है कि बेगम हज़रत महल अपनी सेनाओं के मनोबल को बढ़ाने के लिए मैदान में भी अपने सिपाहियों का नेतृत्व करतीं और अपनी तलवार से अंग्रेजों का डटकर मुकाबला करती थीं. आलमबाग की लड़ाई में तो वह हाथी पर सवार होकर दुश्मन से लड़ने के लिए गईं थीं.

गौर करने वाली बात तो यह है कि इनकी सेन में रानी लक्ष्मीबाई की तरह महिला सैनिक दल भी शामिल था.

छोड़ना पड़ा अवध का सिंहासन, मगर...

अवध की सेनाओं का कुशल नेतृत्व करते हुए वह अंग्रेजों के खिलाफ लड़ती रहीं.

उनकी सेना ने चिनहट और दिलकुशा में हुई लड़ाई में अंग्रेजों को लोहे के चना चबवाने पर मजबूर कर दिया था. लखनऊ के विद्रोह ने तो अवध के कई क्षेत्रों जैसे, सीतापुर, गोंडा, बहराइच, फैजाबाद, सुल्तानपुर, सलोन आदि को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया था.

ऐसा माना जाता है कि 1857 में उनको कई राजाओं का साथ मिला. इनमें राजा जयलाल, राजा मानसिंह, आदि शामिल थे. इन सबके साथ मिलकर हज़रत महल ने अंग्रेजों को लखनऊ रेजीडेंसी में सिर छुपाने के लिए मजबूर कर दिया था.

1857 में इनकी सेना ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे लम्बी लड़ाई लड़ी थी. हालांकि, जल्द ही अंग्रेजों ने अपने बेहतर युद्ध हथियार की बदौलत लखनऊ पर कब्ज़ा कर लिया, जिसके कारण बेगम हज़रत महल को लखनऊ छोड़ना पड़ा था.

दिलचस्प बात तो यह थी कि अपना सिंहासन छोड़ने के बाद भी हज़रत महल के सीने में क्रांति की आग ठंडी नहीं हुई थी. लखनऊ को छोड़ने के बाद, उन्होंने फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्लाह शाह रहमतुल्लाह अलयही के साथ मिलकर अंग्रेजीं हुकूमत के खिलाफ अपने विद्रोह को जारी रखे. अवध के जंगलों को उन्होंने अपना ठिकाना बनाया और गुरिल्ला युद्ध नीति से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया!

अंतिम पलों में नेपाल बना उनका ठिकाना

एक वक्त बाद अंग्रेजों के द्वारा दिल्ली पर कब्ज़ा हो चुका था. 1857 की ग़दर का नेतृत्व करने वाले बादशाह बहादुर शाह जफ़र को बंदी बना लिया गया. इसी के साथ अंग्रेजों का लखनऊ पर भी कब्ज़ा हो गया, जिसके चलते बेगम हज़रत महल अपने बेटे के साथ नेपाल चली गईं.

नेपाल के राजा राना जंग बहादुर लड़ाई के समय अवध की सेना के ख़िलाफ अंगरेज फौज के साथ थे, लेकिन उन्होंने बेगम हज़रत महल को नेपाल में राजनैतिक

शरण (political asylum) दे दी। उनके गुजारे के लिए कुछ वजीफ़ा भी मंज़ूर कर दिया। बाद में ब्रिटिश शासन ने भी उन्हें पेशन देने और कलकत्ता या लखनऊ में

आकर रहने के लिए बुलावा भेजा। भारत की उस स्वाभिमानी बेटी ने अंग्रेजों की बात पर भरोसा नहीं किया। उसने अपने गुलाम देश में जीने के बजाय आज़ाद ग़ैर

मुल्क में मरना पसंद किया। उसने वहां गुर्बत में सीधी सादी जिन्दगी गुज़ारी। चौक काठमांडु में बेगम द्वारा एक मस्जिद भी बनवाई गई।

बेगम हज़रत महल ने अपने देश की आज़ादी की ख़ातिर देश से बाहर की परेशानियां और मुश्किलें झेलते हुए अपना शेष जीवन नेपाल में ही गुजार दिया।

इस तरह वह 7 एप्रिल 1879 को नेपाल में ही उन्होंने अपनी अंतिम साँस लीं और वहीं की मिट्टी में सुपुर्दे खाक (दफन) हो गईं।

हिन्दस्तान की उस स्वाभिमानी बेटी की मज़ार काठमांडू में उसके द्वारा बनवाई हुई मुस्जिद में अब भी मौजूद है। वह मुस्लिम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जब

तक अपने देश में रही, देश की आज़ादी, आबरू और इज़्ज़त के लिए संघर्ष करती रही।

10 मे 1984 को भारत सरकारने उनके सन्मान मे पोस्टल तिकीट जारी किया था।


संदर्भ-1)THE IMMORTALLAS

लेखक SYED naseer ahmed

2)जंग ए आजादी और मुसलमान

लेखक खालिद मोहम्मद खान

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संकलन तथा अनुवादक लेखक अताउल्ला खा रफिक खा पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र

9423338726

Updated : 7 April 2021 5:30 AM GMT
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