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5 जून यौमे शहादत- 1857 क्रांती के महानायक मौलवी अहमदुल्लाह शाह फैजाबादी रहमतूल्लाह अलयही

5 June Yome Martyrdom - Maulvi Ahmadullah Shah Faizabadi Rahmatullah Alaihi, the great hero of the 1857 revolution

5 जून यौमे शहादत- 1857 क्रांती के महानायक मौलवी अहमदुल्लाह शाह फैजाबादी रहमतूल्लाह अलयही
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#आजादी_का_अमृत_महोत्सव


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मौलवी अहमदुल्लाह शाह ( र.अ.) साहब की बहादुरी का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि- विनायक दामोदर सावरकर की नज़र में भी आपका कद कुछ कम ऊंचा नही था।अपनी पुस्तक 'द इण्डियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' में वे लिखते हैं कि इस बहादुर मुसलमान का जीवन दिखाता है कि इस्लामी सिद्धान्त में तर्कशील आस्था किसी भी रूप में भारतीय मिट्टी के प्रति जबरदस्त प्यार की विरोधी नहीं है और इस्लाम धर्म के प्रति सच्ची आस्था रखनेवाला अपने मातृ-देश के लिए मर मिटने मे गर्व महसूस करेगा।

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मौलवी अहमदुल्लाह शाह (र.अ.)

की पैदाइश अवध के एक तालुकेदार

घराने में हुई थी। आपकी शुरुआती तालीम मदरसे में हुई और इस्लामी तालीम मुकम्मल होने के बाद आपने दुनियावी तालीम हासिल की। आप बचपन से ही बहुत ज़हीन थे।घर का माहौल दीनी व कौम-परस्ती का था, सो शुरू से

ही आपने मुल्क की आजादी की बातों में बहुत दिलचस्पी ली और जवान होते-होते आप कौमी तहरीकों में पूरी तरह से लग गये। अंग्रेज़ों के सामने अवध की हार से बेचैन होकर आपने अपनी पूरी ज़िन्दगी मुल्क को गुलामी से निजात दिलाने में लगाने की कसम खायी। लोगों में मज़हबी तबलीग़ के साथ-साथ आप उन्हें बरतानिया हुकूमत और उसके जुल्म के ख़िलाफ़ एकजुट होने के लिए आमादा करते थे। सन् 1856 में जब आप लखनऊ पहुंचे तब पुलिस ने आपकी तहरीके-आज़ादी पर रोक लगा दी

उसके बावजूद जब आपने इसे बंद नहीं किया तो अंग्रेज़ी सरकार ने आपको बंदी बनाकर फैज़ाबाद जेल में बंद कर दिया।

8 जून सन् 1857 को सूबेदार दिलीप सिंह की कयादत में बंगाल के बाद फैज़ाबाद जेल पर हमला करके सारे मुजाहेदीन के साथ आपको भी छुडा लिया गया। जेल से रिहा होने के बाद आपने अपने बिखरे साथियों को इकट्ठा किया और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ नयी जंग की तैयारी करने लगे। 8 जून को अंग्रेज़ों और मुजाहेदीन के बीच सीधा मुकाबला हुआ, जिसमें अंग्रेज़ हार गये और

फैज़ाबाद को आज़ाद घोषित कर दिया गया।

पहली जंगे-आज़ादी 1857 में फैज़ाबाद को एक साल के लिए आज़ाद करानेवाले मौलवी अहमदुल्लाह (र.अ.)को याद किये बिना जंगे-आज़ादी की कहानी पूरी नहीं हो सकती है।

ब्रिटिश हुकूमत के बारे में कहा जाता है कि 18वीं शताब्दी में उनके राज के दौरान सरकार

का सूरज कभी नहीं डूबता था, लेकिन शाह साहब ने फैज़ाबाद को अंग्रेज़ों से आज़ाद करके

उनके सूरज को एक साल के लिए कैद कर लिया।

बेगम हज़रत महल ने आपकी हिम्मत और बहादुरी से असरअंदाज होकर आपको

अपनी फौज का कमाण्डर बनाना चाहा, लेकिन आप उसके लिए राज़ी नहीं हुए पर अंग्रेज़ सिपाहियों को मुल्के-बदर करने के लिए बेगम हज़रत महल के भरपूर मदद का भरोसा दिलाया फिर मौलाना चिनहट, रेजीडेन्सी, दिलकुशा, कैसरबाग, सिकन्दरबाग,आलमबाग सहित सभी लड़ाइयों में शामिल हुए । मार्च सन् 1857 में लखनऊ पर अंग्रेजों के मुकम्मल कब्ज़े के बाद भी मौलाना अपनी लड़ाई लड़ते रहे।

आप लखनऊ से शाहजहांपुर गये और कस्बा मोहम्मदी पर काबिज होकर जंगी साज़ो-सामान का बन्दोबस्त कर नये हमले की तैयारी करने लगे। यहीं नाना साहब,अज़ीमुल्ला खानऔर जनरल बख़्त ख़ान भी आपसे मिले और आपस में सलाह व मशवरा के बाद मोहम्मदी से अंग्रेज़ी फौज को खदेड़कर वहां इस्लामी हुकूमत का कयाम अमल में आया। आपको इस्लामी हुकूमत का अमीर चुना गया, जबकि जनरल बख़्त खान

कमाण्डर बनाये गये और नाना साहब को दीवान बनाया गया।

अवध से निकलने के बाद वतन के सरफरोश जांबाजों की रूहेलखण्ड में अंग्रेजों से आख़िरी जंग हुई। आस-पास में जब अंग्रेज़ी फौज ने कब्ज़ा कर लिया तो अहमदुल्लाह शाह (र.अ.)ने हिकमते-अमली के तहत शहर खाली कर दिया और दो-तीन दिन बाद अचानक हमला कर दिया। आपने शहर की एक मुमताज़ इमारत में आग

लगा दी, जो अब जली कोठी के नाम से जानी जाती है। 13 से 19 मई सन् 1858 तक आपका आक्रमण जारी रहा; अंग्रेज हैरान व परेशान रहे।

दौराने-जंग 1857 में बेगम हज़रत महल लखनऊ की चौलखी कोठी में ही मुकीम रहीं। अंग्रेज़ी फौज ने चौलखी कोठी को चारों तरफ से घेर लिया और भागने के सारे रास्ते बन्द कर दिये। जब मौलवी साहब को मालूम हुआ तो आप अपने कुछ सिपाहियों को लेकर अंग्रेज़ों पर अचानक हमलावर हुए और घेराबन्दी तोड़कर ज़बरदस्त खून-खराबे के बाद बेगम हज़रत महल और अन्य लोगो को तलवार के सहारे से

निकाल ले गये और उन सभी को मूसाबाग जैसी महफूज़ जगह पर पहुंचा दिया। यह वही मूसाबाग है, जहां बेगम हज़रत महल ने लखनऊ की आखिरी जंग में अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया था।

मौलवी साहब की बहादुरी का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि- विनायक दामोदर सावरकर की नज़र में भी आपका कद कुछ कम ऊंचा नही था। अपनी पुस्तक 'द इण्डियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' में वे लिखते हैं कि इस

बहादुर मुसलमान का जीवन दिखाता है कि इस्लामी सिद्धान्त में तर्कशील आस्था किसी भी रूप में भारतीय मिट्टी के प्रति जबरदस्त प्यार की विरोधी नहीं है और इस्लाम धर्म के प्रति सच्ची आस्था रखनेवाला अपने मातृ-देश के लिए मर मिटने मे गर्व महसूस करेगा।

जब अंग्रेज़ सरकार आपको पकड़ने में कामयाब न हो सकी तब उसने दूसरे तरीके का इस्तेमाल किया जिसके तहत उस वक्त के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग ने एक फ़रमान जारी किया जो इस तरह था- सूचित किया जाता है कि जो भी व्यक्ति विद्रोही मौलवी अहमदुल्लाह शाह,

जिन्हें आम रूप से मौलवी कहा जाता है, को जिंदा पकड़कर ब्रिटिश मिलिटरी पोस्ट

या कैंप में लायेगा उसे 50,000 रुपये का इनाम दिया जायेगा। आगे यह भी सूचित किया जाता है कि इसके अलावा लानेवाले विद्रोही को अभयदान दिया जायेगा,बशर्ते कि उसका नाम सरकारी एलान नम्बर 476 में न हो।

मौलवी साहब अंग्रेजों के लिए कितने खतरनाक थे, इसका अन्दाज़ा आपको ज़िन्दा पकड़कर लाने के लिए तय की गयी रकुम से ही लगाया जा सकता है। गौरतलब है कि पहली जंगे-आज़ादी के वक्त 50,000 रुपये की रक्म निहायत ही आसमानी रकम थी।

गवर्नर-जनरल लार्ड कैनिंग का यह फरमान (जिसका नम्बर 580 था) 12 अप्रैल सन्

1858 को गवर्नर-जनरल के इलाहाबाद-कैंप से जारी किया गया था।

लेकिन इसे हमारी बदनसीबी कहिये कि मौलवी साहब की जान लेनेवाला कोई ब्रिटिश सैनिक या अफसर नहीं, बल्कि फैज़ाबाद का ही एक गद्दार ज़र्मींदार था।

5 जून सन् 1858 को मौलवी साहब को पवाई के राजा जगन्नाथ सिंह ने मदद की उम्मीद से पवाई बुलाया। आप जब पवाई के राजा के यहां पहुंचे तो वह अपने भाई के साथ किले की दीवार पर मौजूद था, लेकिन उन लोगों ने जब दरवाजा नहीं खोला तो आपने महावत को दरवाज़ा तोड़ने का हुक़्म दिया। इसी बीच राजा के भाई बलदेव

सिंह ने छुपकर आपको धोखे से गोली मारकर आपका सिर तलवार से अलग कर दिया

और उसे शाहजहांपुर के अंग्रेज़ कलेक्टर के पास ले गया ताकि अंग्रेजों से इनामो-इकराम

हासिल किया जाये। उसके बाद मौलाना के जिस्म के साथ अंग्रेज़ों ने जो बेहुरमती की

उसका अन्दाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता था। अग्रेज़ों ने आपके जिस्म की नुमाइश

पूरे शहर में की और बाद में टुकड़े-टुकड़े करके उसमें आग लगा दी। मौलाना साहब

के सिर की तदफीन जहांगंज की एक छोटी-सी मस्जिद के करीब अमल में आयी।

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संदर्भ -1)THE IMMORTALS

- SYED NASEER AHAMED

(9440241727)

2)लहू बोलता भी है - सय्यद शहनवाज अहमद कादरी

3)The indian war of independents 1857

लेखक- वि. दा. सावरकर

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संकलक तथा अनुवादक लेखक- *अताउल्ला खा रफिक खा पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र*

9423338726

Updated : 5 Jun 2022 11:42 AM GMT
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