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21 आगष्ट -पुण्यतिथी । स्वतंत्रता सेनानी सैय्यद अताउल्लाह शाह बुखारी रहमतूल्लाह अलयही- देश आजादी की खातीर 10 साल बतौर सजा जेल मे गुजारे।

21 Agasta - Punyatithi. Freedom Fighter Syed Ataullah Shah Bukhari Rahmatullah Alaihi - Spent 10 years in jail as a sentence for the sake of the country's independence.

21 आगष्ट -पुण्यतिथी । स्वतंत्रता सेनानी सैय्यद अताउल्लाह शाह बुखारी रहमतूल्लाह अलयही- देश आजादी की खातीर 10 साल बतौर सजा जेल मे गुजारे।
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21 आगष्ट -पुण्यतिथी । स्वतंत्रता सेनानी सैय्यद अताउल्लाह शाह बुखारी रहमतूल्लाह अलयही- देश आजादी की खातीर 10 साल बतौर सजा जेल मे गुजारे।

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🟢सैय्यद अताउल्लाह शाह बुखारी रहमतूल्लाह अलयही

23 सितम्बर सन् 1892 को पटना में पैदा हुए। अपनी शुरुआती मज़हबी तालीम आपने गुजरात में पूरी की और 10 साल की उम्र में अपने वालिद हाफ़िज़ सैय्यद ज़ियाउद्दीन से क़ुरान का हाफ़िज़ा किया। 22 साल की उम्र में आप अमृतसर चले गये और वहां से आला तालीम के लिए दारुल-उलूम ;देवबन्द गये। आप अंग्रेज़ी पहनावे और अंग्रेज़ी भाषा के ख़िलाफ़ थे। आपने 40 साल की उम्र तक अमृतसर की एक मस्ज़िद में दुनियावी तालीम के साथ-साथ क़ुरान भी सिखाया। आप समाजवादी और कम्युनिस्ट ख़्याल के लोगों से अक्सर मिला करते थे और अपने हर खुतबे में अंग्रेज़ों और उनके ज़ुल्म के खि़लाफ बोलते थे।

🟡वैसे तो आपका मज़हबी और सियासी कैरियर सन् 1916 में ही शुरू हो गया था आप अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अवाम को बेदार करने में लगे थे। आप अरबी, फारसी, उर्दू, पंजाबी और मुल्तानी जुबानों में अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ जज़्बाती व जोशीली तकरीर देने के लिए ख़ासे मशहूर हुए। आप अपनी हर तक़रीर में गरीब और पिछड़ों की परेशानियों का इज़हार करते और यह वायदा देते कि अंग्रेज़ों की काली हुकूमत के साथ ही उनके दुःख भी ख़त्म हो पायेंगे।

🟣जालियांवाला बाग़ के हादसे ने आपको हिलाकर रख दिया। यह हादसा आपको इतना मुतास्सिर कर गया कि आपने पूरे मुल्क में सफ़र करके अंग्रेज़ों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और लोगों को अंग्रेज़ों की काली ज़ालिमाना सरकार के खिलाफ इकट्ठा किया। सन् 1919 में अमृतसर में हुए ख़िलाफ़त कांफ्रेंस में आपने ज़बरदस्त तक़रीर की और फिर सन् 1921 में कलकत्ता में जाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सीधा मोर्चा खोल दिया। इन तक़रीरों ने आपको चारों ओर मशहूर कर दिया, चुनांचे आप एक बड़े नेता माने जाने लगे।

🔴आपकी तक़रीरों के लिए ब्रिटिश सरकार ने 27 मार्च सन् 1921 को आपको गिरफ़्तार कर लिया। आप महात्मा गांधी के बग़ैर ख़ून-ख़राबे की जंग के तरीक़े से आजादी हासिल करने के हामी थे। आपने अपने अन्दर एक दावत देनेवाला मुसलमान और एक अवामी नेता को बहुत अच्छी तरह संजोये रखा और सख़्ती के साथ क़ुरान पर अमल करते रहे। बहुत जल्द ही आप अंग्रेज़ों की आंखों में इतना चुभने लगे कि हुकूमत ने उनके बारे में आॅफिशियली यह तक कह डाला कि अताउल्ला एक ऐसा आदमी है जो जितना जेल में बन्द रहे उतना ही हमारे लिए अच्छा है। उसने अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा लोगों को जगाने में लगा दिया है। वह एक ज़बरदस्त स्पीकर है जो अवाम पर सीधे असर डालता है।

मौलाना साहब की तकरीरों का असर इतना था कि जिन आगा शोरिश कश्मीरी ने बाद में आपकी ज़िन्दगी पर किताबें लिखी, वह खुद भी तब आपके गहरे दोस्त होकर समाज सुधार के काम में लग गये थे।

🔵सन् 1941 में एक बार जब आपको गिरफ़्तार किया गया तो जेलर ने आपको बुलाया और *एक माफ़ीनामे पर दस्तख़त करने को कहा जिस पर लिखा था अगर सरकार मुझे इस बार रिहा कर दें तो मैं वायदा करता हूं कि में फिर कभी ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिससे सरकार को कोई एतराज़ हो। हज़रत साहब ने वह माफ़ीनामा उठाया, फाड़ा और पैरों से रौंदकर उस पर तीन बार थूका और जेलर को आंखें दिखाते हुए वापस चले गये। जब उनकी रिहाई में कुछ दिन ही बाक़ी थे तो जेलर ने आपको फिर बुलाया और वही दस्तख़त करने को कहा तो हजरत ने कहा, इस पर अंग्रेजी में कुछ लिखो। जेलर बोला, क्या? *तो हजरत ने कहा, जब तक मैं ज़िन्दा हूं तुम्हारी जड़ें काटता रहूंगा।*

🟡तहरीके-आजादी में आप 8 बार गिरफ्तार हुए और *तकरीबन 10 साल बतौर सजा जेल में बितायी*। हजरत साहब अपनी तक़रीरों के लिए तो जाने ही जाते थे, साथ ही आप एक अच्छे शायर भी थे। आपकी ज़्यादातर गज़ल व गीत फारसी जुबान में लिखी गयी हैं, जिन्हें आपके बड़े बेटे सैय्यद अबुज़र बुख़ारी ने सन् 1956 में सावती उल इल्हाम नाम की किताब में संजोकर रख ली।

🟫मुल्क की तकसीम का सदमा उनके लिये बरदाशत के बाहर था।

भौगोलिक परिस्तिथी मे पाकिस्तान मुलतान मे उन्हे रहना पडा। इसका असर उनकी सेहत पर भी पड़ा था । उनको जेल में डायबिटीज के आरजे ने घेरलिया था। कमज़ोरी दिन बदिन बढ़ती गई और जिंदगी के बाकी चंद साल भी अपने बच्चों के साथ इत्मीनान से नहीं गुज़ारे। यह ज़माना भी वअज़ और तबलीग़ और दूरदराज़ के सफ़र में गुज़रा। उनकी तकरीरों के अगर्चे मौज़ूआत बदल गए थे लेकिन ईमान अफ़रोज़ी में इजाफा गया था।

*1960 ई0 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की ख़्वाहिश पर मिस्टर प्रबोध चंद्र ने उनकी ख़ैरियत जानने के लिये मुलतान में मुलाकात की और उनसे कहा "पंडित नेहरू ने आपको सलाम कहा है।"*

शाह साहब ने गुलूगीर आवाज़ में कहा *"जवाहर लाल जी से कहना कि आप जिस अताउल्लाह को जानते थे वह तो 14 अगस्त 1947 ई0 को ही मर गया था।"*

🟢 हजरत साहब रहमतूल्लाह अलयही ने 21 अगस्त सन् 1961 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। *तक़रीबन दो लाख लोगों ने मुल्तान में उनकी नमाज़े-जनाज़ा में शिरकत की*। मुलतान शहर के कब्रिस्तान जलाल बाकुरी में शाह साहब का मज़ार है।

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🟪 अल्लामा इकबाल रह0 उनकी ख़िताबत के बारे में कहा करते थे कि शाहजी इस्लाम की चलती फिरती तलवार हैं।

🟦 मौलाना ज़फ़र अली खां ने कहा था, "उर्दू में शाह साहब से बड़ा ख़तीब पैदा हुआ न आईंदा भी कई नस्लें उन जैसा ख़तीब पैदा कर सकेंगी।"

🟧मौलाना शौकत अली का ख़याल था कि सैयद अताउल्लाह शाह बुखारी बोलते नहीं, मोती रोलते हैं।

🟩 हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी रह0 ने फ़रमाया था कि "उनकी बातें अताए इलाही होती हैं।"

🟪 हज़रत अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी रह0 ने तो शाह साहब की बुज़ुर्गी और रूहानियत से मुतास्सिर होकर उनके दस्ते हक पर बैअत ही करली थी ।

🟥" शैखुल इस्लाम हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी रह0 ने बुख़ारी साहब को इस ज़माने में इस्लाम की ज़बान करार दिया था।

🟧पंडित नेहरू उन्हें खिताबत का ताजमहल कहते थे ।

🟩 महात्मा गांधी ने कहा था: *"शाह जी आग हैं जो दुश्मनों के नशेमन फूंक सकती है और दोस्तों के चूल्हे जला सकती है, वह हवा को रोक कर उससे रवानी और समंदर को ठहरा कर उससे तुगयानी हासिल करते है।

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संदर्भ-1 -THE IMMORTALS - SYED NASEER AHAMED

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2 : *लहू बोलता भी है*

- *सय्यद शहनवाज अहमद कादरी,कृष्ण कल्की*

3)फखरे वतन

--- फारूक अर्गली

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संकलक लेखक तथा अनुवादक - *अताउल्लाखा रफीक खा पठाण सर, टूनकी,तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र*

9423338726

Updated : 21 Aug 2022 5:17 AM GMT
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