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19 आगष्ट - पुण्यतिथी । जंग ए आजादी के कद्दावर नेता, काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष , स्वतंत्रता सेनानी जस्टीस बदरुद्दीन तैय्यबजी

19 Agasta - Death anniversary. Jung-e-Azadi's stalwart leader, former Congress President, Freedom Fighter Justice Badruddin Tyabji

19 आगष्ट - पुण्यतिथी । जंग ए आजादी के कद्दावर नेता, काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष , स्वतंत्रता सेनानी जस्टीस बदरुद्दीन तैय्यबजी
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बदरुद्दीन तैय्यबजी का ख़ानदान अरब से आकर बम्बई मे आ बसा था। आपका जन्म 8 ऑक्टोम्बर 1844 को हुवा. पिता का नाम तैय्यब अली और मा का नाम आमेना था.

अच्छे घराने में पैदा होने के बाद भी आपने शुरुआती तालीम मदरसे में हासिल की और आला तालीम एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट से हासिल की। सन् 1883 में जब अलबर्ट बिल आया और फ़साद बढ़ा तो हिन्दुस्तान की ओर से मुक़दमा लड़ने के लिए बदरूद्दीनजी ही आगे बढ़े। उन दिनों आपका नाम बड़े जाने-माने बैरिस्टरों में जाना जाता था। आप बम्बई विधान परिषद के नामिनी मेम्बर भी रहे। आप तहरीके़-आज़ादी के सरगर्म कारकुन भी रहे और अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तंज़ीमों के ज़रिये आम ज़िन्दगी के हर पहलू पर जद्दोजहद करते रहे। आपका ख़ानदान शुरू से कांग्रेस से जुड़ा हुआ था, जिसका पूरा असर तैय्यबजी पर भी पड़ा और आप कांग्रेस की हर तहरीक में सरगर्मी से हिस्सा लेने लगे। कांग्रेस के चलाये सभी मूवमंेट में हिस्सा लिया और जेल भी गये।

बम्बई के गवर्नर लाॅर्ड रीए जब मुसलमानों को कांग्रेस के आंदोलन सेे अलग रखने की मुहिम चलाकर साज़िश रच रहे थे, तब बदरूद्दीन तैय्यबजी को असरअंदाज़ करने के मक़सद से वायसराय के साथ उनकी मुलाक़ात करायी गयी। वायसराय ने तैय्यबजी को एक तोहफ़ा देकर मुसलमानों की बहुत तारीफ़ की और अंग्रेजो से दोस्ती का भरोसा दिलाया। जवाब में तैय्यबजी ने कहा कि मैं हाक़िमो की तरफ़ से दिया गया तोहफ़ा लेने से डरता हूं। माज़रत के साथ इसे वापस ले लें। रही बात हुक़्मरानो से दोस्ती की, तो मेरी राय में आम सियासी मामलो पर हिन्दुस्तान के मुसलमानों को मैं दूसरे मज़हब के लोगों के साथ मिलकर हल करने या तहरीक के ज़रिये लेने का हामी हूं। आप जिस मुस्लिम सम्मेलन में भाग लेने के लिए दावत दे रहे हैं, मैं ऐसे हर उस कांफ्रेंस की मुख़ालिफत करूंगा जो कांग्रेस को कमज़ोर करने के लिए किया जा रहा है।

सन् 1887 मद्रास में हुए कांग्रेस के इजलास में तैय्यबजी सदर चुने गये।

अपने आपने सदारती ख़ुतबे में कहा कि भारत में सब कौम के लोग मिलकर हर मुमकिन कोशिश करें कि सरकार से सुधार और बड़े अख़्तयारात हासिल किये जायेगे, जो हम सभी के लिए फायदेमंद होगा। मेरी राय है कि हमलोग मिलकर ज़ोरदार तरीके से आवाज़ उठायें तो हमे हमारा हक़ मिल सकता है।

कई सालों की मेहनत के बाद कांग्रेस के ज़िम्मेदार क़ायद के तौर पर आप मुसलमानों को यह समझाने में क़ामयाब हुए कि सियासी मामले में कांग्रेस का साथ दे और क़ौमी मामलों में अपने फ़ैसले के लिए आज़ाद है। उन्होंने अपनी कोशिशों से वह शक भी दूर किया जिसके चलते मुसलमानों को यह लगता था कि जिन तंज़ीमों में हिन्दुओं की अक़सरियत है, उनमें उनका हक़ नज़रअंदाज किया जायेगा।

बदरुद्दीन तैयबजी का सबसे बड़ा कारनामा बाम्बे में मुसलमानों की शिक्षा के लिए "अंजुमने इसलाम" नाम की शिक्षण संस्थान की स्थापना है । 1874 में तैयबजी ने अपने बड़े भाई जस्टिस कमरुद्दीन और कुछ दोस्तों को अपने घर बुलाया, वहां उन लोगों ने 1857 के स्वंतत्रा संग्राम के बाद बने हालात विशेष रूप से मुसलमानों के हालात की समीक्षा की और फैसला किया कि मुम्बई में एक स्कूल खोला जाए, जिससे मुस्लिमों की शिक्षा को बेहतर बनाया जा सके इसके लिए "मुंशी ग़ुलाम मोहम्मद" साहब को दिल्ली लाहौर और लखनऊ भेजा गया कि देखें वहां स्कूल किस तरह बने हैं शिक्षा का क्या प्रबंध है ..!!

मुंशी ग़ुलाम मोहमद के तीनों जगहों से लौटने के बाद एक मीटिंग हुई जिसमें अंजुमने इसलाम की स्थापना की बात तय हुई, तुरंत तैयबजी ने साढ़े सात हजार रूपए और मोहम्मद अली रूखे साहब ने दस हज़ार रुपए देने का ऐलान किया, जो उस समय के हिसाब से एक बड़ी रकम थी शुरू में किसी के घर में 628 बच्चों के साथ शुरू किया गया यह संस्थान आज 145 वर्षों के बाद भारत के बड़े शिक्षा संस्थानों में से एक है, इसके अंतर्गत 97 स्कूल, कालेज और इंस्टीट्यूट चल रहे हैं, जिनमें एक लाख बीस हजार से अधिक छात्र व छात्रा पढ़ रहे हैं।

बदरुद्दीन तैयबजी के परिवार में एक से एक लोग पैदा हुए। जिन्होंने देश को आज़ाद कराने और उस की तरक्की व शिक्षा व्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान दिया है ..!!

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि इनके बड़े भाई जस्टिस कमरुद्दीन भी कांग्रेस के संस्थापक सदस्य थे, इनके भतीजे अब्बास तैय्यब जी बड़ौदा राज्य के चीफ जस्टिस थे, गांधी जी के आव्हान पर "डांडी मार्च" में शामिल हो गए, वह गांधी जी के निकटतम सहयोगियों में से थे।

बदरुद्दीन तैयबजी के पोते जिनका नाम भी बदरुद्दीन तैयबजी था ।

( दादा और पोते का नाम समान होने से कई बार संभ्रम निर्माण हो जाता है।)

वो सिविल सेवा में थे, वह नेहरू जी के पसंदीदा आफीसर्स में से एक थे। अशोक चक्र को भारतीय राजकीय प्रतीक बनाने का सुझाव इन्होंने ही दिया था।आजादी के बाद ईरान समेत कई देशों में भारतीय राजदूत रहे, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर भी रह चुके हैं ..!!

इनकी पत्नी सुरैय्या तैय्यब जी ने भारतीय राष्ट्रध्वज तिरंगा को "डिजाइन" किया था, मशहूर इतिहास कार इरफान हबीब साहब का संबंध इसी परिवार से है ..!!

आपका इंतक़ाल 19 अगस्त सन् 1906 को हुआ।

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संदर्भ -1)THE IMMORTALS

- SYED NASEER AHAMED

2)लहू बोलता भी है - सय्यद शहनवाज अहमद कादरी,कृष्ण कल्की

3) shamsher ali

Teesrijungnews. com

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संकलन तथा अनुवादक *अताउल्लाखा रफीकखा पठाण सर टूनकी तालुका संग्रामपूर जिल्हा बुलढाणा महाराष्ट्र*

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Updated : 21 Aug 2022 9:01 AM GMT
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