Home > About Us... > 1857 के बाद अंग्रेज़ो का कई बार क़त्ल ए आम करनेवाला संघठन ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का Khudai Khidmatgar।

1857 के बाद अंग्रेज़ो का कई बार क़त्ल ए आम करनेवाला संघठन ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का Khudai Khidmatgar।

1857 के बाद अंग्रेज़ो का कई बार क़त्ल ए आम करनेवाला संघठन ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का Khudai Khidmatgar।
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23 एप्रिल दिन विशेष-

1857 के बाद अगर अंग्रेज़ो द्वारा किसी संगठन विशेष के लोगों का कई बार क़त्ल ए आम किया गया तो वो है ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का Khudai Khidmatgar संगठन।


ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने इस संगठन द्वारा सरहदी इलाक़े पर रहने वाले उन पठानों को अहिंसा का रास्ता दिखाया, जिन्हें इतिहास में हमेशा 'लड़ाके' के तौर पर दिखाया गया था।

साल 1929 के नवम्बर मे वजुद में आए ख़ुदाई ख़िदमतगार नामक संगठन ने कुछ माह मे ही इतनी मक़बुलियत हासिल कर ली और इतना मक़बुल हो गया के इस संगठन में लगभग एक लाख लोग शामिल हो गए। इनका लिबास लाल था; इस लिए इन्हे 'सुर्ख़ पोश' भी कहा गया।

ख़ुदाई ख़िदमतगार के रज़ाकारो ने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की क़यादत में शांतिपूर्ण तरीक़े से अंग्रेज़ी पुलिस, फ़ौज और उनकी ज़ालिमाना नितीयों की मुख़ालफ़त करना शुरू कर दिया।

ख़ुदाई ख़िदमतगार ने हड़तालों और दिगर सियासी कारनामो के ज़रिया अंग्रेज़ी हुकुमत के ख़िलाफ़ बेहतरीन कामयाबी हासिल की और ये 'खईबर क़बाईली' इलाक़ो में एक मज़बुत सियासी तंज़ीम बन कर उभरी; इलाक़े मे इस तंज़ीम का असर ये था के इसके एक इशारे पर वहां कुछ भी हो सकता था।

इसके बाद अंग्रेजो़ ने इस संगठन को हर तरह से दबाने की कोशिश की; यहां तक के क़त्ल ए आम भी करवाया।

ख़ुदाई ख़िदमतगार से जुड़े लोगों के साथ पहला क़त्ल ए आम 23 अप्रील 1930 को पेशावर के क़िस्साख़्वानी बाज़ार नामक जगह मे हुआ जहां 400 से अधिक निहत्थे लोग अंग्रीज़ी गोली का शिकार हुए और मारे गए; हज़ारो घायल हुए।

दुसरा क़त्ल ए आम 30 मई 1930 को टक्कर नमक जगह पर हुआ और वहां भी 70 से अधिक निहत्थे लोग मार दिए गए और सैंकड़ो घायल हुए।

तीसरा क़त्ल ए आम 24 अगस्त 1931 को हांथीखेल नामक जगह पर हुआ जहां 80 से अधिक निहत्थे लोग मार दिए गए और सैंकड़ो घायल हुए।

ख़ुदाई ख़िदमतगार के वजुद में आए हुए दो साल साल भी नही हुआ था और इस के हज़ारो की तादाद में रज़ाकार गिरफ़्तार और क़त्ल कर दिए गए।


चश्मदीदो के हवाले से लोग बताते हैं और इतिहासकार लिखते हैं, के जब फ़ौज द्वारा गोली बारी की जा रही थी और लोग शहीद होते जा रहे थे तो उस समय भी ख़ुदाई ख़िदमतगार के रज़ाकार अपनी विचारधारा से कोई समझौता नही किया और अहिंसा पर क़ायम रहे; यहां तक के जाम ए शहादत पी लिया। शहीद होने से पहले लोगो ने "कलमा ए तैयबा" और क़ुरान शरीफ़ की आएत मुबारक पढ़ी और पुरा इलाक़ा "नारा ए तकबीर - अल्लाह ओ अकबर" की सदाओं से गुंज उठता पर किसी ने हिंसा के रुप में जवाब नही दिया, यहां तक के 23 अप्रील 1930 को पेशावर के क़िस्साख़्वानी बाज़ार मे गढ़वाल राइफ़ल रेजिमेंट के दो प्लाटूनों ने निहत्थी और अहिंसात्मक भीड़ पर गोलियां चलाने से इनकार कर दिया।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने इस पुरे वाक़िये को कुछ इस तरह कहा है :- "अंग्रेज़ो का मानना था कि एक अहिंसक पख़्तुन (पठान) एक हिंसक पख़्तुन से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है इस लिए उन्होने पख़्तुनो को हिंसक बनाने के लिए अपनी पुरी ताक़त लगा दी जितनी उनके पास थी"

ये दुनिया के इतिहास के उन बड़े कत्लेआम मे से एक है जिसमे निहत्थे और अहिंसक भीड़ को खुले तौर पर गोलियों से निशाना बनाया गया।

Source -

Md Umar Ashraf

संकलन अताऊल्ला खा पठाण सर टूनकी बुलढाणा महाराष्ट्र

Updated : 23 April 2021 4:39 AM GMT
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